सहकारी समितियों से ग़ायब हुई यूरिया , किसान कैसे करें खरीफ़ की टॉप ड्रेसिंग …..

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सहकारी समितियों से ग़ायब हुई यूरिया , किसान कैसे करें खरीफ़ की टॉप ड्रेसिंग …..

अभाव व ब्लैक मार्केटिंग पर असहाय हुआ प्रशासन …

266:50 रुपये एम आर पी अंकित कीमत की जगह 280 से 350 रुपये प्रति बोरी बिक रही यूरिया …

अधिकतम खुदरा मूल्य से भी अधिक कीमत पर धड़ल्ले से बिक रही है यूरिया …

विजय चौधरी / सह संपादक

अम्बेडकरनगर। किसान हित का दम्भ भरने वाली केन्द्र और सूबे की सरकार में आज किसान चौतरफ़ा बेबस व लाचार नजर आ रहा है । किसान हितों को लेकर चलाये सारे सरकारी उपक्रम आज निस्प्रोज्य हो चलें हैंं ।
विदित हो कि किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह द्वारा किसानों के उत्पादन , भण्डारण , मंडी , वस्त्र , उर्वरक आदि के लिए सेठ साहूकारों के याचना व गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए सहकारी समितियों की स्थापना करायी गयी । शनै शनै इन समितियों पर प्रबंधतंत्र इन्हीं सेठ साहूकारों का कब्जा होता गया और यह समिति अब किसान उत्पीड़न केन्द्र के रूप जाना जाने लगा ।
आज जब किसान अपने खरीफ़ फसल की रोपाई कर चुका है तो उसे अपने फसल की टॉप ड्रेसिंग के लिए यूरिया की महती आवश्यकता है । तो ऐसे में जहाँ सरकारी उपक्रम सहकारी समितियों से यूरिया नदारद हो चली है । वहीं बाजारों की प्राइवेट दुकानदार मंहगी कीमत वसूल रहें हैंं ।
नित किसानों के हित में फ़रमान जारी करने वाली सूबे व केन्द्र की सरकार में किसान के उपयोग में आने वाली यूरिया एक ऐसी उत्पाद है जिसके हर बोरी पर स्पष्ट अंकित अधिकतम खुदरा मूल्य 266 रुपया 50 पैसे है । पर प्रशासन के संरक्षण में धड़ल्ले से ऊंची कीमतों पर बेचीं जा रही है । इसमें सरकारी उपक्रम के रूप में स्थापित की गयी साधन सहकारी समिति भी पीछे नहीं है । सहकारी समितियों व प्राइवेट दुकानों पर यही यूरिया 280 रुपये से 350 रुपये प्रति बोरी खुलेआम धड़ल्ले से बिक रही है । यूरिया की इस कालाबाजारी पर सरकारी अमला भी ख़ास मेहरबान नज़र आ रहा है ।यूरिया के अभाव व ब्लैक मार्केटिंग से जूझ रहे क्षेत्र के किसानों की आवाज प्रशासन के नक्कारखाने में दफन होती जा रही है ।

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