मंहगाई, अस्पतालों की अव्यवस्था, लूट घसोट,पेट्रोल डीजल की बढ़ती कीमतों को छिपा लिया है कोरोना

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मंहगाई, अस्पतालों की अव्यवस्था, लूट घसोट,पेट्रोल डीजल की बढ़ती कीमतों को छिपा लिया है कोरोना

गुलाब चंद्र यादब

अम्बेडकरनगर। पेट्रोल, डीजल की बढ़ती कीमतें सामान्य और गरीब जनता को वैसे दूर कर देगी जैसे मिट्टी के तेल से हुई है।गांव से लेकर शहर तक अमीर गरीब मनुष्य केरोसिन तेल कैसा होता है,उसके विषय में चर्चा परिचर्चा करना ही भूल गया ,आने वाली पीढ़ियां मिट्टी के तेल को इतिहास के पन्नों से जानेंगी। आज जब मौसम बदलता है,बिजली गुल होने पर लोग मोमबत्ती का सहारा लेने लगे हैं।रेल की गाड़ियों को स्पेशल बना कर किराया अधिक लेकर चलाया जा रहा है। कोरोना का इतना भय है कि लोग बिना पूँछे भुगतान कर दे रहे हैं । रोजमर्रा की बस्तुएं बाजार के हिसाब से चलती हैं।जिसकी मांग बढ़ाना हो उसे कोरोना में लाभदायक होगा ,विज्ञापन दे दीजिए ,चार लोग बैठकर डीबेट करना शुरू कर दें ,कीमत बढ़ जाएगी और घटिया माल का व्यवसाय भी उत्तम दर्जे का हो जाएगा, मनुष्य की आंत बड़ी लंबी है सब कुछ पचा लेगी ,कोरोना का वायरस भी हिंदुस्तानियो को उनके रहन सहन और स्वभाव से भलीभांति परिचित हो गया है।मार्च के शुरुआत में वह निकल पड़ता है,अप्रैल में गलाघोंटू जो पशुओं को होती है,जिस पशु को होती है,वह कुछ ही देर में छटपटा कर दम तोड़ देता है।मनुष्य भी ऐसे ही मिलते जुलते वायरस के वायरल वाले नेटवर्किंग सिस्टम में फंस गया है। कोरोना वायरस ने कई वर्षों से कठिन तपस्या किया ,जानकारी साझा किया ,कई उन कमजोर विभिन्न रोगों वाले वायरस और वैक्टीरिया वालों से मिलकर सायं 7 बजे से लेकर सुबह 7 बजे तक डिबेट किया ,कैसे रूप बनाया जाए जिससे सम्पूर्ण मानव जाति भय से सोसल डिस्टेंस बनाते हुये कोने में छुप जाए और एक एक करके मरते हुए लोंगों को देखे और खुद मर जाये।ऐसा ही कुछ मिलता जुलता वाकया इस मार्च और अप्रैल के महीने में देखने को मिला है।


यह चित्र जिला अस्पताल अम्बेडकर नगर के इमरजेंसी वार्ड 2 में बेड नम्बर 12 पर भर्ती 80 वर्षीय राम अंजोर यादव का है।आर टी पी सी आर और एंटीजन नेगेटिव है।कोरोना को मानकर इलाज शुरू हुआ ।सी टी स्कैन में स्कोर 14/25,मॉडरेट लिखा मिला ,लंग्स काफी खराब है ,कंडीशन अच्छी नहीं।भर्ती करने वाले चिकित्सक ने कहा आन काल फिजीशियन डॉक्टर देखेंगे ,सुबह 10 बजे भर्ती हुवा सीरियस अवस्था मे 9 घंटा अपने जीवन को बचाने के लिए झेल गया ,फिजीशियन सायं 7 बजे पहुंचा, बिना देखे फरमान सुना दिया ,कोरोना है टांडा या फिर मेडिकल कालेज ले जाएं।जिला अस्पताल में चिकित्सक से लेकर वार्ड बाय, नर्स दिशाहीन थे ,ऑक्सीमीटर की स्प्रिंग ढीली, तो ब्लडप्रेशर की मशीन चलती ही नहीं,जब तक मरीज सम्भलता तब तक बी एस टी पर कुछ लिख दिया ।सामान्य मरीज भी कोरोना के नाम पर इधर उधर छिप रहे थे। लंबी लंबी सांस लेते हुए लोगों के लिये बेड नहीं ,स्ट्रेचर पर ही दम तोड़ दिया ,फटे हुए बेड पर चद्दर ही नहीं। जिलाअस्पताल का सी एम एस इमरजेंसी या वार्डो में कभी नहीं आया । गंभीर मरीज का तीमारदार भी खाली आक्सीजन कर सिलेंडर को भरा समझकर अपने मरीज की तरफ लेकर चला जाता ।सीएमओ कार्यालय में बैठकर अधिकारी कोरोना की मॉनिटरिंग करते सुनाई देते। मरीज दवा के अभाव में तड़पते अपनी जान की भींख अपनी आंखों से माँगता। न मिलने पर उसकी आंखें हमेशा के लिए बंद हो गयी । हाँ इतना था कोरोना के डर से मरीज के साथ आने वाले तीमारदारों की संख्या कम थी । नेता भी कोरोना के डर से फ़र्जदाएगी नहीं कर पाए ,इस पर अवश्य ही कोरोना वायरस अफसोस कर रहा होगा।
जिलाअस्पताल से टांडा एम सी एच ,मेडिकल कालेज एक ही सड़क पर है ।वेचारे ठीक होने के लिये वहां गए परंतु दहशत से वे तड़पते हुए भारी लापरवाही का शिकार हो गए । न किसी की सहानुभूति और न ही दूसरे का अपनापन, कोरोना वायरस से निपटने के लिए गांव गांव में टोटका होने लगा ।अस्पताल से सीधे लाशें शमशान घाट पर पहुँचने लगी। मेडिकल कालेज टांडा की एम्बुलेंस में चार से अधिक लांशे महादेवा घाट पर पहुचने लगीं।पी पी ई किट पर लगी दफ्ती पर लिखे नाम से अपनी किस्मत और अब तक लिखी मौत को अंतिम मानकर सत्य की खोज में अपने घर चला आया । दूसरे का दुःख तब तक अच्छा लगता है जब तक अपने पर नहीं पड़ता । कोरोना वायरस ने अपनों को भी दूर कर दिया ।अव्यवस्था के आलम में चिकित्सा व्यवस्था दिशाहीन थी।व्यवस्था देने वाले ऊपर के आदेशों की समीक्षा और रिपोर्टिंग करने में पस्त थे, मरीजों के तीमारदारों के थरथराते ओठों से निकलती आवाजें ट्रक से उतरते आक्सीजन सिलेंडर को देखकर दब जाती।ऐसी त्रासदी प्रकृति के बैलेंस को लेकर है या फिर मानव द्वारा निर्मित जानबूझकर कहीं के प्रयोगशाला से निकाला गया मजबूत से कुछ समय बाद कमजोर कड़ी की यह दुर्दांत वायरस है।

उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव में कोरोना वायरस ने जो कहर बरपाया है,अपनों को खो चुके पीड़ित परिवार कई पीढ़ी तक संभल नहीं पाएंगे। कोरोना के भय से सारे सवाल दब गए हैं,चालाक लोग उसे अवसर में बदलने से नहीं चूक रहे हैं।
लाकडाउन के बाद कोरोना कमजोर होकर कहीं चला गया है ,नौकरी पेशा लोग अपनी इम्युनिटी बढाने के लिए योग,आयुर्वेद और होम्योपैथी की तरफ भाग रहे हैं,एलोपैथी पर पतंजलि बाबा रामदेव हमले कर रहे हैं।प्रत्येक घर के एक एक सदस्य एलोपैथी पर निर्भर हो चुका है। सत्य तो यह है कि जब कोविड वाले अस्पतालों में जाने वाले मरीजों की वापसी असम्भव होने लगी ,तब गांव के मरीज झोलाछाप डॉक्टरों,भाप और देशी काढ़े का प्रयोग करके अपनी जान बचाये। आयुर्वेद और देशी दवाएँ एलोपैथिक दवाओँ पर भारी पड़ी हैं।एम बी बी एस ,एमडी ,बड़े बड़े बोर्ड लगाए ,बड़े बड़े अस्पताल कराहते ,तड़पते मरीजों से कोरोना की गाइडलाइंस बताकर मुँह मोड़ लिए।
एलोपैथिक चिकित्सकों ने जिसे कंडीसन खराब बताकर भर्ती करने से मना कर दिया,जिलाअस्पताल अकबरपुर और मेडिकल कॉलेज सददरपुर टांडा के बड़े तीसमारखाँ चिकित्सक देखने नहीं आये,कई वर्षो के संबंधों को तिलांजलि दे दी गयी ,जिला अस्पताल के चिकित्सक कोरोना के आगे 5 घंटे तक बीपी नहीं लिए, वे फालिज के लक्षण को कोरोना वायरस का हमला बता कर छुट्टी ले लिए।मरीज का तीमारदार चिल्लाता रहा ,परंतु जिला अस्पताल का सीएमएस यह कहता रहा यहाँ से ले गए तो मैं फिर भर्ती नहीं करूंगा। होमकोरोनटीन पर आज जिंदगी बचाने में सफल हैं।
कोरोना वायरस के हमलों से जो बच गए, उनके परिवार वालों की महानता है ,वे जागरूक हैं,जो स्वयं लड़े ,उनकी इस लड़ाई में उनके आसपास की मानवता वाले लोंगों ने साथ दिया ।कोई भी विपत्ति आये ,डरे नहीं ,मानवता और सम्बेदना को मत टूटने दीजिये। हमने भी यह जंग जीती अपने पिता को बचाया ,बड़े बड़े डॉक्टरों से अपने पिता की जिंदगी के लिए भीख मांगा, मेरे आँखों से निकलते आंसुओं को मेरे पिताजी ने देखा, होमकोरोटीन में रहकर मजबूत इच्छा शक्ति से कोरोना पर विजय प्राप्त किये।


बड़े बड़े एलोपैथिक अस्पतालों के चक्कर में मेरी बड़ी बहन कोरोना से लड़ते हुए जंग हार गई।उत्तराखंड के नैनीताल जिले में वह राजकीय इण्टर कालेज में प्रधानाचार्य थीं, ऊधमसिंह नगर के काशीपुर शहर में उनका निजी मकान है,गुड़गांव से लेकर ऋषिकेश मेडिकल कॉलेज में भी वही परिस्थितियां थीं जैसा मैंने अम्बेडकर नगर के विषय मे ऊपर लिखा है। ऋषिकेश में एम्बुलेंस से लेकर लकड़ी वालों ने लाशों से भी पैसा वसूले हैं। रोते हुए अपनी माँ को खो चुके तीन बच्चों ने अपने पिता के साथ पीपीई किट पहनकर दाहसंस्कार किया ,यह एक हृदयविदारक घटना हैं।क्या हमारे देश ,समाज ,धर्म में विपत्ति के समय भी मजबूरों को लूटने की परंपरा लायी जा रही है ।हम मूकदर्शक बने हुए हैं।कोरोना काल में मजबूर और बेबस जनता अपने बंद घरों में भी लुटती रही है। लूटने के रास्ते अलग अलग हैं।
आज अपने और समाज में पनपे दर्द को लिखा जाए ,तो लोंगों को राजनीति दिखाई देती है।भला हो उन लोंगों को जो इस पीड़ा से गुजरे नहीं।समाज के प्रत्येक व्यक्ति को दूसरे की संवेदना उसके दुखदर्द को भी समझना होगा ,साथ ही यह भी समझना होगा कि कहीं हम किसी लंबे समय की सामाजिक समस्याओं का शिकार तो नहीं हो रहे हैं ।यह भी सोचना और समझना होगा कि यह महामारी मार्च अप्रैल में ही क्यों आ रही है?मुझे लगता है कि हमारे देश के वैज्ञानिक इस पर शोध कर रहे होंगे।

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