विश्व क्षयरोग दिवस पर हुआ संवेदीकरण कार्यक्रम , मेडिकल कॉलेज में किया गया आयोजन

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विश्व क्षयरोग दिवस पर हुआ संवेदीकरण कार्यक्रम

मेडिकल कॉलेज में किया गया आयोजन

अम्बेडकरनगर। राजकीय एलोपैथिक मेडिकल कॉलेज के लेक्चर हॉल में MBBS छात्रों के साथ एक संवेदीकरण कार्यक्रम का आयोजन विश्व टीबी दिवस के अवसर पर किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्वलित कर किया गया। इस मौके पर बोलते हुए प्राचार्य डॉ0 संदीप कौशिक ने बताया कि क्षयरोग (टीबी) के प्रति वर्ष 1,00,000 लोगों में 159 नए संक्रमणों के कारण भारत इस समय दुनिया में टीबी रोगियों की सबसे बड़ी संख्या वाला देश है। इस अवसर पर मुख्य अतिथि WHO कंसल्टेंट डॉ0 अश्विनी यादव ने बताया कि भारत में एमडीआर-टीबी रोगियों की संख्या सबसे ज्यादा है और बिना पहचान वाले टीबी रोगियों की संख्या भी कम नहीं है। ऐसे कई लाख मामले हैं, जिनकी पहचान ही नहीं हुई है, न ही इलाज शुरू हुआ और ये लोग अभी तक स्वास्थ्य विभाग के राडार पर भी नहीं हैं।
उपस्थित बच्चों को संवेदित करते हुए नोडल अधिकारी डॉ0 मुकुल सक्सेना ने बताया कि टीबी एक बेहद संक्रामक बीमारी है। इसका इलाज पूरी अवधि के लिए तय दवाएं सही समय पर लेने से इसे ठीक किया जा सकता है। ड्रग रेजीमैन या दवा के इस पूरे कोर्स को डॉट्स कहा जाता है और इसे राष्ट्रीय क्षयरोग उन्मूलन कार्यक्रम के तहत मुफ्त प्रदान किया जाता है। आज भी हमारा समाज टीबी जैसी घातक बीमारी के बारे में पर्याप्त जागरूक नहीं है, जिसके कारण एक सामान्य सा दिखने वाला टीबी का मरीज अनजाने में अपने साथ-साथ साल में लगभग 10-14 नए लोगों को टीबी का मरीज बना जाता है। जानकारी व जागरूकता से इससे बचा जा सकता है। टीबी रोग जो कमजोर लोग हैं, बुजुर्ग हैं, हमेशा धूम्रपान करते हैं, स्लम एरिया में रहते हैं, फैक्ट्रियों में काम करते हैं ऐसे व्यक्तियों को होने की अधिक संभावना रहती है। इसके लिए अपने आस-पास विशेष रुप से स्वच्छता पर भी ध्यान देना चाहिए। टीबी भारत में जन-स्वास्थ्य की एक प्रमुख चिंता है, भारत में विश्व का लगभग 27% टीबी केस पाया जाता है। यह न केवल बीमारी और मृत्युदर का एक प्रमुख कारण है, बल्कि देश पर भी एक बड़ा आर्थिक बोझ भी है। इसके उन्मूलन के लिए जरूरी है कि 1,00,000 लोगों में एक से अधिक व्यक्ति को इसका नया संक्रमण न होने पाए। यह तभी संभव है जब रोगियों को बिना रुकावट दवा मिलती रहे और उनकी बीमारी का समय पर पता लगा लिया जाए।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए डॉ0 उमेश वर्मा कहा कि इलाज में कोई भी रुकावट तेजी से एमडीआर-टीबी रोगी के जोखिम को बढ़ा सकती है। मिसिंग डोज डॉट्स थेरेपी के उद्देश्य को ही धराशायी कर देती है। पूरा इलाज न होने पर ऐसे मरीज अन्य लोगों को भी संक्रमित कर सकते हैं।


इस मौके पर मेडिसिन विभाग के डॉ0 अवधेश कुमार ने बताया बलगम की जांच व सीने का एक्सरे करके इसका निदान संभव है। फिर जल्दी से उपचार शुरू होना चाहिए। प्रभावी चिकित्सा के साथ ही रिपोर्टिग भी आवश्यक है।
इस मौके पर यूथ आइकॉन प्रवीण गुप्ता द्वारा शार्ट वीडियो के माध्यम से छात्रों को संवेदित किया गया।

यहां कुछ सुझाव हैं, जो टीबी संक्रमण को फैलने से रोकने में मदद कर सकते हैं।

:- छींकते, खांसते या हंसते समय अपने मुंह या नाक के पास टिश्यू/रुमाल रख लें।

:- दूसरों के साथ निकट संपर्क से बचें।

:- अपने कमरे को नियमित रूप से वेंटिलेट करें। क्योंकि टीबी छोटे, बंद स्थानों में फैलता है।

इस मौके पर मुख्य रूप से डॉ0 बृजेश, डॉ0 जितेंद्र वर्मा, डॉ0 विजय यादव, डॉ0 पंकज, डॉ0के0पी0एन0 सिंह, डॉ0 संजीव पांडेय, परामर्शदाता प्रवीण गुप्ता, वरिष्ठ क्षयरोग पर्यवेक्षक अरविंद भास्कर, जिला पीपीएम राजीव माथुर, सौरभ मौर्य, वर्षा श्रीवास्तव आदि उपस्थित रहे।

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