महिला सशक्तिकरण पर युवा नेत्री का बेवाक विचार ….

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महिला सशक्तिकरण पर युवा नेत्री का बेवाक विचार ….

महिलाओं की आबादी आधी होने के बावज़ूद आज भी पुरुष प्रधान समाज मात्र तीन प्रतिशत महिला नेतृत्व स्वीकार कर सका है : वंदना पटेल ..महिला विधानसभा अध्यक्ष अपना दल ।

विजय चौधरी / सह संपादक

अम्बेडकरनगर। सूबे में त्री पंचायती चुनाव का शंखनाद हो चुका है । गांवों की गलियां चौराहों पर लगे पोस्टर बैनर इसके चुंगली भी करना शुरू कर दिये हैंं । यद्यपि संविधान ने आधी आबादी को 33 प्रतिशत आरक्षण भी निर्धारित कर दिया है । प्रत्येक वर्ष नारी सशक्तिकरण की रवायतें भी बखूबी निभाई जा रहीं हैंं । फिर भी आंकड़ों पर यदि विश्वास किया जाय तो अभीतक मात्र तीन प्रतिशत महिलाओं का नेतृत्व यह पुरुषप्रधान समाज स्वीकार कर सका है । जो महिला सशक्तिकरण की निष्ठा पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह है ।
जबकि इस धरती के सौंदर्य का सबसे बड़ा स्वरूप नारी है । बात शक्ति का हो या प्रेयसी का , संस्कृति की विरासत का हो या फिर धरती के पाप मर्दन का , इन सभी का सानिध्य का स्वरूप का सम्बन्ध नारी से ही जुड़ा हुआ है ।
हालांकि कई कवितायें इस प्रसंग को लेकर मानव मस्तिष्क को जरूर झकझोरती हैंं कि आखिर नारी पर लिखना बाकी क्या रह गया है ? जिसने चूल्हा चक्की व चिलमन की ओट से निकलकर आज नारियां हवाई जहाज से लेकर सरहद की सुरक्षा एवं चाँद पर पहुंचकर अपनी बुलन्दी का परचम लहरा चुकीं हैंं । जयशंकर की माने तो
“आँसू से भीगे आंचल पर मन का सबकुछ रखना होगा ।
तुझको अपनी स्मित रेखा से यह संधि पत्र लिखना होगा ॥ “
बात आज की करें तो जिस स्वरूप में मानव समाज जा रहा है उसमें महिलाओं की भूमिका पर चर्चायें तो खूब हो रहीं हैंं । पर महिला नेतृत्व लोगों को रास कम आ रहा है । प्रसंगवश यदि बात बिहार की करें तो एक बात वहां साफ उभर कर सामने आयी है कि वहां महिलाओं का नेतृत्व बढ़ा है । जैसा कि सरकारी आंकड़े बताते हैंं कि 60 प्रतिशत से ज्यादा जमीन की रजिस्ट्री महिलाओं के नाम हो रहें हैंं । पंचायतों में 50 प्रतिशत आरक्षण बिहार सरकार देना प्रारम्भ कर दिया है । भारत सरकार के गजट में यह बात साफ़ उभरकर सामने आयी है कि बिहार प्रांत ने महिला सशक्तिकरण का एक बेहतर नमूना पेश किया है । जो अनुकरणीय है ।
प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी हमारा समाज 8 मार्च को एक दिन महिला सशक्तिकरण की रवायत बड़ी शिद्दत से निभाया । जिसमें महिलाओं के प्रति आदर , सम्मान व उनकी तरक्की पर खूब कसीदे पढ़े गये । सम्मान उस स्वरूप को जिसको हम मानतें हैंं । माँ , बहन , बेटी , पत्नी , देवी जो भी शब्द इनके लिए प्रयोग करतें हैंं । फिर भी उनके लिए केवल एक दिवस ?
इस दिवस पर हमें यह संकल्प लेने की जरूरत है कि आज देश की 80 प्रतिशत महिलाएं अस्पताल जाने के लिए भी अपने पतियों से पूंछती हैंं । अगर कार्य क्षेत्र की बात करें तो समाज की 75 महिलाएं ऐसी हैंं जिनको प्रतिभा के आधार पर नहीं बल्कि चेहरे के आधार पर नौकरी हासिल हो पा रही है । हमारे समाज की मात्र तीन प्रतिशत महिलाएं ऐसी हैंं जिनका नेतृत्व समाज बर्दाश्त कर पा रहा है । यही कारण है कि जनसंख्या के लिहाज़ से मात्र तीन प्रतिशत महिला ही राजनीति में हिस्सेदार बन सकीं हैंं ।


महिला सशक्तिकरण की चाहे जितनी बाते राजनीति या समाज के किसी भी पायदान पर करें पर हक़ीक़त यही है कि इस पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को उचित जगह देने में उसी का बेटा कतरा जाता है जिसने माँ के आंचल का पल्लू व अंगुली पकड़कर आंगन में चलना सीखा है । वही आज जब उसके सम्मान की बात आती है तो अपने नौ महीना गर्भ में पालने वाली माँ को भूल जाता है ।
महिला दिवस पर हम सबको एक संकल्प लेना होगा कि अगर झांसी की रानी आज़ादी दिला सकती है तो समाज में पनप रहे महिलाओं के प्रति असुरी प्रवृति रूपी का नाश कोई देवी ही कर सकती है और ऐसे में महिलाओं का वह स्वरूप यदि समाज में मजबूती से खड़ा होता है , तो निश्चित रूप से तो समाज में व्याप्त बहुत सी विकृतियां स्वतः मिट जायेंगी ।
वंदना पटेल ..
हमारे धर्म ग्रंथों में वर्णित “यत्र पूज्यते नार्यस्तु , तत्र रमन्ते देवता !
फिर भी आज हम इनकी वास्तविक स्थित से अनभिज्ञ हैंं । एक आम महिला का जीवन घर परिवार , चूल्हा – चक्की में कब बीत जाता है पता ही नहीं चल पाता है । कई बार तो घर – परिवार के कारण महिलाओं को अपने अरमानों का भी गला घोंटना पड़ जाता है फिर भी उसे वह सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं मिल पाती जिसका वह असली हक़दार होती है । एक भारतीय महिला अपने परिवार के खातिर अपने जीवन को भी दांव पर लगाने से नहीं चूकती ।
हमें यह भी सोचना चाहिए कि एक नारी का सारा जीवन पुरुष के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चलने में ही बीत जाता है । बदले में सभ्यता का लबादा ओढ़े इस पुरुष प्रधान समाज ने उसे दिया क्या है ।
त्री -पंचायती चुनाव के इस चुनावी महा समर में संविधान द्वारा प्रदत्त महिला के 33 प्रतिशत आरक्षण पर भी सवार होकर पुरुष वर्ग अपनी वैतरणी पार करने में जुटा हुआ है । जिससे आज भी महिला अपने आत्म परिचय की मोहताज़ हो चली है ।

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