चने की फसल मे उकठा रोग का प्रबंधन : प्रो. रवि प्रकाश

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चने की फसल मे उकठा रोग

का प्रबंधन : प्रो. रवि प्रकाश

लखनऊ। आचार्य नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय कुमारगंज अयोध्या द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केन्द्र सोहाँव बलिया के अध्यक्ष प्रोफेसर रवि प्रकाश मौर्य ने चने की खेती करने वाले किसानों के लिये सलाह दिया कि इस समय कही- कही चने में उकठा बीमारी के प्रकोप की जानकारी मिल रही है। इस रोग से सतर्क रहने की आवश्यकता है।

यह बीमारी फ्यूजेरियम आक्सीस्पोरम फफूंद से फैलता है यह मृदा व बीज जनित बीमारी है। जिसके कारण 10-12 प्रतिशत तक पैदावार कम हो जाती है। यह फफूंद बिना पोषक या नियंत्रण के भी मृदा में लगभग 6 बर्षों तक जीवित रह सकती है। इस रोग मे पौधे धीरे- धीरे मुरझा कर सूख जाते है। पौधों को उखाड़ कर देखने पर उसकी मुख्य जड़ एवं शाखाएं सही सलामत दिखाई देती है। छिलका भूरा रंग का होता है। जड़ को चीर कर देखने पर उसके अन्दर भूरे रंग की धारियां दिखाई देती है। इस रोग का प्रकोप पौधे के किसी भी अवस्था मे हो सकता है। रोग लगने पर प्रबधन कठिन होता है। प्रबंधन के लिये ट्राकोडर्मा 5 ग्राम या कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत 2ग्राम प्रतिलीटर पानी मे घोल कर पौधो की जड़ को तर कर दे, इससे रोग का फैलाव नही होगा। तथा भविष्य मे 3-4 बर्षो तक उस खेत मे दलहनी फसलें न लें। खेत खाली होने पर गर्मी मे मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करें। चार लाईन चना के बाद सरसों या अलसी की एक लाईन लगाये। प्रति एकड़ 20 कुन्टल गोबर की सड़ी खाद प्रयोग करने से उकठा रोग मे कमी आती है।

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