प्राकृतिक संपदा के कोष और नैसर्गिक सुषमा के आगार: हमारे वृक्ष : डा ओ पी चौधरी

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प्राकृतिक संपदा के कोष और नैसर्गिक सुषमा के आगार:हमारे वृक्ष : डा ओ पी चौधरी

वाराणसी। वन है तो भविष्य है,यह कथन बहुत ही सटीक है। मानव जीवन का अस्तित्व ही छोटे छोटे हरे भरे पौधो व वृक्षों के साथ ही प्रारंभ हुआ, जब प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा अपना भोजन बनाना शुरू किया। भारतीय संस्कृति में तो वृक्षों की पूजा की जाती है। पीपल, नीम,तुलसी,शमी, आंवला,बरगद,केला,आम आदि अनेक वृक्ष बहुत ही पवित्र माने जाते हैं और उनकी विविध रूपों में विधिवत पूजा – अर्चना की जाती है। मां की आंचल की भांति वृक्ष हमें छाया देते हैं,क्षुधा शांति के लिए फल देते हैं,जो हमारे शरीर को हृष्ट और पुष्ट बनाते हैं।जल संरक्षण व बरसात करवाने में इनकी अत्यंत महत्ता है।हमारे अनेक तरह के जीव जंतुओं को आश्रय देते हैं,जो जैव विविधता के लिए आवश्यक है। कोविड –19 जैसी महामारी फैलने से रोकते हैं,क्योंकि पर्यावरण को शुद्ध रखते हैं और अनेक हानिकारक जीव इन्हीं की गोंद में समाए रहते हैं।औद्योगिकरण के बढ़ते कदम और अनियंत्रित गति से बढ़ती हुई जनसंख्या वृद्धि के कारण आबादी के लिए वृक्षों की बड़े पैमाने पर कटान हो रही है।परिणामस्वरूप अनेक जंगली जीव जंतु जो मानव जीवन को क्षति पहुंचा सकते हैं,वे आबादी क्षेत्र में आ जा रहे हैं और हमें नुकसान पहुंचा रहे हैं।यद्यपि 1950 से वन महोत्सव कार्यक्रम आयोजित किया जाता रहा है लेकिन खाना पूर्ति तक ही सीमित हो रहा है।वृक्षों को कटाई के लिए भी अनुमति प्राप्त करना आवश्यक है,लेकिन फिर भी विकास के नाम पर अंधाधुंध कटाई जारी है।पुराने और बड़े वृक्षों को काटकर हम अपना रास्ता तो चौड़ा कर ले रहे हैं लेकिन जीवन का मार्ग बाधित कर रहे हैं। नए पौधे लगा रहे हैं,लेकिन उचित देखभाल के अभाव में वे जीवित ही नहीं बच पा रहे हैं और यदि बच भी गए तो उन्हें पूरा वृक्ष बनने में एक अरसा लगेगा।इस तरह हम पुराने की भरपाई नहीं कर पा रहे हैं।मैं अपने गांव मैनुद्दीनपुर,जलालपुर, अंबेडकर नगर में पेड़ लगाकर अपने कर्मक्षेत्र काशी चला आता हूं। इस अवधि में उनको पानी और खाद देने का काम मेरे सहोदर बड़े भाई श्री राधे श्याम चौधरी(अवकाश प्राप्त जेल अधीक्षक)बड़ी शिद्दत के साथ करते हैं,इस कार्य में मेरे भतीजे शिशिर का योगदान भी कमतर नहीं आंका जा सकता है। इस तरह एक नन्हा सा पौधा वृक्ष बनकर हमें तो सुख देता ही है, धरती मां की भी शोभा और आयु बढ़ाता है तथा मुफ्त में सभी को प्राण वायु ऑक्सीजन देता है व मानवों सहित जानवरों को भी छाया प्रदान करता है। इस तरह एक पेड़ को तैयार होने में काफी समय,श्रम लगता है। इनकी हरीतिमा अत्यंत मनोहारी दृश्य उत्पन्न करती है, मन को सकून देती है।फिर भी हम इन्हें काट रहे हैं। अनेक प्राकृतिक आपदाओं का कारण वनों की कटान है–अतिवृष्टि,अनावृष्टि, बाढ़, सूखा,भूकंप,भूस्खलन,धूल भरी आंधी आदि वन संपदा की अनियंत्रित कटाई के फलस्वरूप ही उत्पन्न हुई है।इतना ही नहीं इसका यह भी दुष्परिणाम हुआ है की वन्य जीवों की अनेक प्रजातियां विलुप्त हो गई हैं और प्रतिदिन लुप्त होती जा रही हैं,जिनका असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। प्रदूषण बढ़ने के कारण हम अनेक रोगों की चपेट में आ रहे हैं। वनों से ही हमें अनेक प्रकार की जड़ी –बूटियां व औषधियां प्राप्त होती हैं,जो हमारे स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी हैं। वृक्ष अपनी सघन जड़ों से मिट्टी को पकड़े रहते हैं और हमारी कृषि योग्य जमीन की उर्वरकता बनाए रखते हैं,उन्हें क्षरण से रोकते हैं,रेगिस्तान के प्रसार को भी रोकते हैं। इनकी पत्तियां नीचे जमीन पर सड़कर खाद के रूप में काम आती हैं। इनसे हमें फल – फूल तो मिलता ही है, भवनों एवम् अन्य कार्यों हेतु लकड़ियां भी प्राप्त होती हैं।वनों से अनगिनत लाभ हैं उन्हें गिनाना मुश्किल है।अभी कोरोना काल में गिलोय,तुलसी, अश्वगंधा आदि का जन मानस ने बहुत प्रयोग किया एवम् अपनी इम्यूनिटी बढ़ाकर महामारी को शिकस्त दिया।जीव वैज्ञानिक इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि हमारे इकोसिस्टम को ये संतुलित करते हैं। लेकिन जिस तरह से इन संसाधनों का अनियंत्रित ढंग से उपयोग हो रहा है उससे चिंता की लकीरों का उभरना स्वाभाविक ही है। हम जरूरत से ज्यादा दोहन प्राकृतिक संपदा का कर रहे हैं,तो उसका खामियाजा भी हमें ही या आगे आने वाली पीढ़ी को ही भुगतना पड़ेगा।प्रकृति का अनुपम सौंदर्य हमसे दूर होता जा रहा है। ऑक्सीजन की कमी होती जा रही है,हम इसके लिए बड़े शहरों में क्लबों में जा रहे हैं।पर्यावरण का सीधा संबंध प्राकृतिक संसाधनों से है। अतएव हमें अधिक से अधिक वृक्ष लगाना चाहिए, उनके बड़े हो जाने तक परिवार के एक सदस्य की भांति उनका पालन पोषण करना चाहिए। अभी उद्घोष (पर्यावरण को समर्पित, एक संस्था,पलामू) के कर्ता धर्ता भाई कमलेश जी तथा पीपल, नीम, तुलसी के संस्थापक और सम्पूर्ण धरा को हरा भरा करने का संकल्प लेकर अपने जीवन को पर्यावरण के लिए समर्पित कर देने वाले डा धर्मेंद्र कुमार सिंह (पटना,बिहार)के सहयोग से एक बड़ा पर्यावरण सम्मेलन 9 मई, 2021 को झारखंड के पलामू जिले के लेसलीगंज प्रखंड के कुंदरी गांव में जहां एशिया का दूसरा सबसे बड़ा लाह का बागान है,आयोजित किए हैं, मुझे भी अतिथि के रूप में,एक पर्यावरण सेवक के नाते आमंत्रित किया गया है, यह मेरा सौभाग्य है कि देश के पर्यावरण प्रेमियों, पर्यावरणविदों के सानिध्य में कुछ सोचने –समझने का सुअवसर प्राप्त होगा।
पर्यावरण संरक्षण आज की सबसे बड़ी जरूरत है।प्रदूषण को दूर भगाना है, तो पर्यावरण का स्वच्छ होना,प्राणियों के जीवन के लिए बहुत जरूरी है।अतएव हमें पेड़ –पौधों के प्रति “आत्मवत सर्वभूतेषु” के भाव का विस्तार करना होगा और “माता भूमि: पुत्रो अहम पृथिव्याः”का अनुगामी बनना होगा।जोहार धरती!जोहार प्रकृति।


डा ओ पी चौधरी
एसोसिएट प्रोफेसर मनोविज्ञान विभाग
श्री अग्रसेन कन्या पी जी कॉलेज वाराणसी।
मा.राज्यपाल नामित कार्य परिषद सदस्य वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर।
मो: 9415694678

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