अखिल भारतीय शिक्षा समागम

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(7 -9 जुलाई,2022,वाराणसी)। यह पोस्ट उनके लिए है जो लोग अखिल भारतीय शिक्षा समागम वाराणसी में बाकायदा आमंत्रण पत्र मिलने के बावजूद उद्घाटन सत्र,7 जुलाई,2022 में उपस्थित नहीं हो पाएं (जो कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 क्रियान्वयन विमर्श पर आधारित था)और पछता रहे हैं कि काश! थोड़ा पहले पहुंच जाते।

यह विमर्श मुख्यतः उच्च शिक्षण संस्थानों के कुलपतियों/निदेशकों/शिक्षकों के लिए था। निर्देश था कि 12:30 तक सभी को सीट ग्रहण कर लेना है और कार्यक्रम शुरू होगा 1:30 पर तो हम नियत समय से आधा घंटा पूर्व 12:00 बजे रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर वाराणसी पहुंच गए।

वहां पहुंचने पर पता चलता है कि सभागार भर चुका है तो हमने सोंचा चलिए वापस चलते हैं , आयोजकों को थोड़ा कोसते हैं कि तभी किसी ने कहा नहीं पुनः द्वार खोला जा रहा है तो हम लोग सभागार में प्रवेश करने के लिए मुख्य द्वार की ओर बढ़ें तो देखा आमंत्रित शिक्षकों की एक लंबी कतार लगी हुई है मालूम होता है कि रूद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर का मुख्य द्वार नहीं बल्कि केदारनाथ धाम हो गया है जहां विद्वान विमर्श करने नहीं बल्कि भक्त दर्शन करने आ रहे हों।जिसमें पुरुष शिक्षक बहुत अधिक है कुछ ही महिला शिक्षक थी जहां दो कतार लगानी थी एक पुरुषों की और एक महिलाओं की वहां 3 कतार लगी हुई थी पुरुषों की और एक महिलाओं की उसमें भी महिला शिक्षकों को बस इतनी जगह मिली थी कि वह जैसे तैसे खड़ी हो सके । उसमें भी मुख्य द्वार के पास पहुंचते पहुंचते वह जगह भी पुरुषों द्वारा जब्त कर ली गई। शिक्षकों के लिए विशेष परेशानी थी की वह अब बीच में आ चुके ना तो वह बाहर जा सकती थी और ना ही अंदर फिर क्या किसी तरह बचते बचाते धक्के खाकर कुछ तो अंदर पहुंच गए और कुछ बाहर ही जान बचाकर निकल गई। अब पूर्णतः द्वार बंद कर दिया गया। और दूरदराज से आए हुए बड़ी संख्या में शिक्षक वापस लौट गए। शायद उन्होंने गलती की थी जो आमंत्रण पत्र मिलते ही अपना सम्मान समझ कर या इस विमर्श में शामिल होने वहां आ गए थे। खैर हम भी किसी महानुभाव द्वारा धक्का खाकर अंदर हो गए । अंदर जाते ही हमारी नजरें खाली कुर्सियों को खोजने लगी। तभी हमारे महाविद्यालय का समूह एक स्थान पर बैठा नज़र आया जिन्होंने इशारे से हमें बुलाया कि उन्होंने दो कुर्सियां जब्त कर रखी है। हम दो लोग थे चैन की सांस लेकर बैठ गए। बैठ क्या गए हम तो कुछ देर सदमें में रहें द्वार के दृश्य के बारे में सोचकर किसी के अभिवादन का भी बोध न रहा। कुछ देर बाद जब संयत हुए तो छायाचित्र निकाली गई सबके साथ सेल्फी और अकेले उस पोस्टर के साथ। दिल जो लोग अन्दर नहीं आ पाए थे उनमें हमारे महाविद्यालय के भी कुछ साथी थे उनके लिए तरसता रहा। अत्यंत वृहद सभागार खूब आधुनिक तकनीक से सजा हुआ भव्य लग रहा था। लाल कुर्सियां अतिथियों के स्वागत में पलकें बिछाए सुव्यवस्थित तरीके से मंच को शोभायमान कर रहीं थीं। तभी एक सुन्दर महिला संचालिका डायस पर आती हैं और अपने मधुर कंठ से सभागार में उपस्थित सभी महानुभावों का स्वागत, अभिवादन और उनकी गरिमा का बोध कराती हुई उनके सौभाग्य की खूब सराहना करती हैं। साथ ही काशी के गौरवमयी कथा का वर्णन अत्यंत दार्शनिक भावबोध के साथ सबके समक्ष प्रस्तुत कर स्वयं भी गौरवान्वित महसूस करती हैं। उसके पश्चात सभागार में उपस्थित सभी विद्वतजनों को स्वयं पर गर्व महसूस कराने हेतु उन्हीं के स्थान पर अंगवस्त्र भेंट किया जाता है। और संचालिका महोदया द्वारा उसके गरिमापूर्ण महत्व से सभी को अवगत कराया जाता है आप सभी ज्ञान का दीपक जलाने वाले हैं और जीवन को एक नई राह दिखाने वाले हैं (इसका प्रमाण पूरे सभागार की लाइट बुझाकर उनके हाथ में धारित मोबाइल फोन में प्रयोग की जाने वाली टार्च जलवा कर किया गया ) यह उसी के सम्मान में इक बहुत छोटी सी भेंट है आप इसे धारण करें और इस ऐतिहासिक, विदेशी तर्ज पर बना,आधुनिक तकनीकी सुविधाओं से लैस सभागार जो कि माननीय प्रधानमंत्री जी की परिकल्पना का साकार रूप है, गौरवान्वित महसूस करें। सभी उसे धारण कर गौरवान्वित महसूस कर ही रहे थे कि देश के चोटी के वैज्ञानिक एवम् राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन ” के. कस्तूरी रंगन ” जी मंच पर उपस्थित हुए। सभी सजग हो गए। तभी उधर से संचालिका महोदया ने उनका स्वागत करते हुए बताया कि माननीय प्रधानमंत्री जी का आगमन किसी भी वक्त हो सकता है। पूरा सभागार सचेत हो गया सबकी निगाहें मंचासीन कस्तूरीरंगन जी का तिरस्कार करते हुए मुख्य द्वार पर जा टिकीं। उसी भांति जैसे बचपन में हमारी निगाहें आम के पके फल से लदे आम के पेड़ों का तिरस्कार करते हुए एक्का- दुक्का पके जामुन पर जा टिकती थीं।अब गिरे तब गिरे हम लपक लें और जब वो गिरता था तो जमीन पर भरता हो जाता था हम बस ताकते रह जाते थे। खैर इन्तज़ार ख़त्म होने और दीदार होने के बीच की खाई को पाटती हुई संचालिका जी की मधुर वाणी में शक्कर और अधिक मात्रा में घुलती जा रही थी और स्रोताओं के उत्साह में ऊर्जा। आखिरकार इन्तज़ार ख़त्म हुआ और पलक झपकते ही जिसका सभी को था इंतज़ार वो चेहरे और हाथ अभिवादन में ऊपर उठे मंच पर सुशोभित होने लगे। तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा सभागार गूंज गया, मंच प्रसन्न हो गया, सबके चेहरे की लालिमा छलकने लगी अब गिरे तब गिरे, उत्साह इतना कि बड़ी मुश्किल से कुर्सी पकड़कर बैठ सके कुछ लोगों के तो धैर्य का बांध टूटते-टूटते बच गया नहीं तो हनुमान जी बनकर छलांग लगाते और श्री चरणों में विराजमान हो जाते। किन्तु लगता है आरम्भ में संचालिका महोदया ने जो गरिमाबोध कराया था वह सफल रहा। अब मंच प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, शिक्षामंत्री, आदि अन्य मंत्रीगण से फलित था और कार्यक्रम शुरू हुआ। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के दृश्य एवं मंच कला संकाय की छात्राओं द्वारा सरस्वती वंदना की प्रस्तुतिकरण से।तदुपरांत स्वागत एवं विषय प्रवेश की औपचारिकता में माननीय धर्मेंद्र प्रधान जी द्वारा पर्चा पढ़ा गया। उसके बाद मुख्यमंत्री जी का उद्बोधन जिसमें काशी और प्रधानमंत्री जी के प्रति विशेष आभार अधिक था, हुआ। हमने भी उन्हें पहली बार शिक्षा को शिक्शा कहते हुए साक्षात सुना। यह मेरी उपलब्धि थी।

अब बारी थी मुख्य अतिथि की जिनकी वाणी को सुनने के लिए सब के कान तरस रहे थे। सदी के महानायक किसी ने मेरे बगल से कहा तो मेरे दिमाग में उसका विलोम खदबदाने लगा। उन्होंने डायस पर स्वयं को संयत किया हमने सोंचा आवाज़ आएगी भाइयों और बहनों किन्तु…… ऐसा नहीं हुआ, हमारा दिल टूट गया, कितनों का टूटा होगा। हमारी पूर्वधारणा धराशायी हो गई और हमें विश्वास हो गया कि पूर्वाग्रह से ग्रसित होना बिल्कुल गलत है। उधर से आवाज़ आई साथियों। हमें लगा यह परिवर्तन आकस्मिक है या कोई सोंची समझी चाल फिर दिमाग ने कहा शायद शिक्षा समागम होने के कारण या इतने मीम्स बन रहे हैं उनके डर के कारण। यदि यह टी.वी सीरियल होता तो इस समय तीन बार मेरे चेहरे को आश्चर्य प्रकट करते हुए दिखाया जाता। सभागार में उनकी एक-एक बात पर तालियां ऐसे बज रहीं थीं जैसे शब्द नहीं मोती झर रहे हों और सभी मालामाल हो रहे हों। तो मै भी इस विचारों के महाजाल से जल्द ही बाहर आ गई। तो देखा कि एक महानुभाव जो हमारी पंक्ति से दो पंक्ति आगे बैठे थे नगीनों से भरी उंगलियों और दोनों हथेलियों को इतनी बेरहमी से पूरे जोश में ऐसे पीट रहे थे जैसे नगाड़े को पीटा जाता है। हमें उनकी हथेलियों पर तरश आ रहा था। माननीय ने सबको खूब कर्तव्य बोध कराया और बताया कि परम्परागत तरीके से जीने वाले लोगों को स्वयं को आने वाली पीढ़ियों की प्रतिभा के अनुसार अपडेट करना होगा। नहीं तो स्थित यह आएगी बच्चा आपका दिमाग खाएगा और आपका दिमाग उसका जवाब नहीं दे पाएगा। उद्बोधन हो गया आगे की तीन-चार पंक्तिबद्ध विद्वानों का सौभाग्य प्राप्त हुआ मंत्री जी से हाथ मिलाने का बाकी जो बैकबेंचर थे कसमसाते हाथ मलते रहे। सेल्फी लेने के लिए अपने आस पास के लोगों को मुंह चिढ़ाते भाग कर गैलरी में पहुंचे कि मोती सीप में कैद हो चुका था अब क्या अपना सा मुंह लिए वापस हो लिए। अब तक सभागार अत्यंत शान्त और अनुशासित था। अब बारी थी के.कस्तूरीरंगन जी के वृहद और विमर्शकारी उद्बोधन की। वे डायस पर आए बोलना शुरू किए किन्तु आधे से अधिक सभागार गुड़ में लगे चींटे की भांति माननीय मंत्रियों के पीछे बाहर चला गया ।द्वारपाल की बस की ना थी उन्हें रोक पाना और ना ही संचालिका महोदया की मधुर वाणी का कोई असर बचा था और न ही कस्तूरीरंगन जी की गरिमा और सम्मान का बोध और न ही उनके बेहतरीन अंग्रेजी का प्रभाव ही उन्हें रोक पा रहा था। हम सब भी शिक्षक होने के दायित्व का निर्वहन करते हुए , कस्तूरीरंगन जी के सम्मान में प्राचार्य जी के साथ अभी अभी खाली हुई आगे की पंक्तिबद्ध कुर्सियों पर आकर बैठ गएं। कुछ देर यूं ही सुनते रहे फिर लगा कि इनकी अंग्रेजी दिमाग अधिक जोर देने पर बल दे रही है और दिल का तिरस्कार कर रही है जिससे दिल और दिमाग का सम्बन्ध जुड़ नहीं पा रहा है अर्थात मामला बोझिल होता जा रहा है तो भलाई इसी में है कि विच्छेद कर लिया जाए स्वास्थ्य के लिहाज से भी यही ठीक रहेगा। तो हृदय में ही कस्तूरीरंगन जी के क्षमाप्रार्थी होते सभागार से बाहर हो लिए। बाहर आए तो प्राचार्य जी के कुछ चिर परिचित लोग थे जिनसे मुखातिब हुए जैसे फूल मुखातिब होते हैं प्रसन्नता के साथ। समूह छायाचित्र खींचे गए। इस समागम में शामिल होने वाला हर व्यक्ति कुछ न कुछ मोती के कण चुराकर ले जा रहा था। जिसका घर जाकर बखान कर रहे होंगे अपनों के बीच- कोई आह्लादित था, कोई गौरवान्वित था अन्तिम छोर तक तो किसी को यह कसक थी की देख तो लिया पर काश! छूकर महसूस भी कर पाते।

तो कुछ लोगों को बेचैन कर रही होंगी शिक्षकों का विद्यार्थी से भी बदतर व्यवहार, अतिथि का तिरस्कार, कुछ ताने कि मोदी के कार्यक्रम में गए थे लगता है देश की स्थित से अवगत नहीं हैं। जवाब में अपना बचाव यह कहकर, कर रहे होंगे कि शिक्षकों का आयोजन था और हम शिक्षक हैं।

आगामी दिनों में आप शामिल हों यदि आप वास्तव में विमर्श करना चाहते हैं। खासकर उन महाविद्यालयों के लोग जहां शिक्षकों का अभाव है। एनईपी के क्रियान्वयन में आ रही कठिनाइयों को बताइए।

डा प्रिया भारतीय
सहायक आचार्य,हिंदी विभाग
श्री अग्रसेन कन्या पी जी कॉलेज वाराणसी।

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