‌‌पाती जो सबको भाती,बताती बात पते की,मन को मुदित कराती

1 min read

“न कोई खत न संदेश……गए परदेश”…..
“हर कोई बांचे चिट्ठियां,मनवा न बांचें कोई”…
“खत लिख दीजिए सांवरिया के नाम”……….
“फूल तुम्हें भेजा है खत में,फूल नहीं मेरा”……

संपादकीय। अनगिनत फिल्मों में गाए गए गीत बीते दिनों की बात हो गई।कुछ दिन बाद बच्चे इन गीतों को केवल सुनेंगे,उसका मतलब नही समझेंगे।
वो चिट्ठियां जाने कहां खो गईं ? वो इबारत, वो खूबसूरत लिखावट, संवेदनाओं का पुलिंदा,भावनाओं को उमड़ कर बरसाने वाले शब्द सब कुछ तारीख हो गए।
आज सुबह व्हाट्सएप पर मेरे भांजे बब्बू ( विपुल चौधरी,पी आर ओ, कुलपति, किंगजार्ज चिकित्सा विश्विद्यालय लखनऊ) का संदेश मिला,


“तमाम डाकखाने प्रेम से चलते रहे
और कचहरियां नफरत से।
हैरत की बात है कि
डाकखाने बन्द हो गए और
कचहरियां बढ़ती चली गई”।


वास्तव में जिसने भी लिखा, बहुत खूब लिखा। डाकिया के आते ही मन में उमंग की जो तरंगे उठती थी, वे अकल्पनीय है और कचेहरी जाने के नाम पर ही मन सिहर उठता है,लेकिन हुआ यही कि हम धैर्य खोते रहे और कचहरियां बढ़ती गई,हमारे मन के फासले भी गहराते गए। खैर ये बात फिर कभी आज मन पत्र पर ही अटका है,उसी की बात की जाय।


पाती, खत,चिट्ठी,पत्र, कागद…….लेटर आदि न जाने कितने नाम। किंतु मकसद एक हाल चाल,खैर मकदम,कुशलता की चाह, संयोग, वियोग,शिकवा शिकायत, सूचना, संवेदना,तकलीफ,कष्ट,सुख दुःख,हंसी मजाक और न जाने कितने विषयों को अपने में समेटे जब आती थी तो बांछे खिल जाती थी,कुछ को देखकर रोंगटे भी खड़े हो जाया करते थे। जिनमें लिखने के सलीके छुपे होते थे। भाषा भी अभ्यास से निखरती थी।
अकसर शुरुआत,सादर अभिवादन, प्रणाम,स्नेह,आशीर्वाद, वन्दे

पाती जो सबको भाती,बताती बात पते की,मन को मुदित कराती


हम ठीक हैं …
आपकी कुशलता की कामना…
से शुरू होते थे,
छोटों को स्नेह, प्यार एवम् आशीष
और बड़ों के चरणस्पर्श पर ख़त्म होते थे।
और बीच में लिखी होती थी अक्खा जिंदगी,
संयोग वियोग, विछोह, विवशताएं,
मौसम, सुख- दुख, प्यार दुलार, मनुहार, मुन्ने के आने की खबर,
मां की तवीयत का दर्दं, आजी के आंख से न दिखने की और बाबा के कान से कम सुन पाने की पीड़ा, न जाने क्या क्या, और पैसे भेजने का अनुनय,
फसलों के खराब होने की वजह,
गाय के बच्चा देने की खबर,
कितना कुछ सिमट जाता था,
एक सफेद से कागज में नीली स्याही से, लाल लहू लिख देते थे, जिसे कोई भाग कर सीने से लगाती, और अकेले में आंखों से आंसू बहाती।
मां की आस थी ये चिट्ठियां,
पिता का संबल थी ये चिट्ठियां,
बहिनों की रक्षा कवच थी ये चिट्ठियां,
बच्चों का भविष्य थी ये चिट्ठियां,
और गांव का गौरव थी ये चिट्ठियां,
यादों की पुलिंदा थी ये चिट्ठियां,
एक अनुपम दस्तावेज थी ये चिट्ठियां,
नौकरी की आस थी ये चिट्ठियां,
खूबसूरत लम्हों की याद थी ये चिट्ठियां,
अतीत की स्मृतियों की मधुर याद थी ये चिट्ठियां, न जाने किस किस की आस थी ये चिट्ठियां, बिन लिखे बहुत कुछ कह जाती थी चिट्ठियां, कभी खुशी का खजाना तो कभी दुखों का पहाड़
होती थी ये चिट्ठियां, वास्तव में कितनी तरह की होती थी ये चिट्ठियां।


आज भी बक्से (जो अभी हमारी पीढ़ी के कुछ लोग सहेजे हैं, बाकि आधुनिकता की भेंट चढ़ गए,गोदरेज और त्रिवेणी आ गई) में मिल जाती है,तो एक बार पढ़ ली जाती हैं। दशकों पूर्व का दृश्य सामने होता है।
अब तो बहुत से बच्चों ने पोस्ट कार्ड, अंतर्देशीय,पोस्ट ऑफिस वाला लिफाफा देखा ही नहीं होगा जिसे हमारे डी आई जी (अ. प्रा.) डी के चौधरी साहब बक्शे में सहेज कर रखे हैं,हमने भी रखा है। सेवा राम भैया (पूर्व वरिष्ठ जेल अधीक्षक) भी रखते थे,अब भय वश उसे नष्ट कर दिए,फिर भी कुछ हैं।


अब तो स्क्रीन पर अंगूठा दौड़ता है
और अक्सर ही दिल तोड़ता है,
मोबाइल का स्पेस भर जाए तो,
सब कुछ क्षण भर में डिलीट होता है,
सब कुछ सिमट गया छोटी सी स्क्रीन में जैसे मकान सिमट गए फ्लैटों में,
जज़्बात सिमट गए मैसेजों में,
पानी सिमट गया बोतलों में,
धरती मां कंक्रीट के जंगलों में,
मिट्टी के चूल्हे सिमट गए गैसों में,
और इंसान सिमट गए घरों में,पैसों में,…..,
दुनियां सिमट गई मुठ्ठी में,मोबाइल में……।
सादर अभिवादन हम पुरानियों का- जो खत लिखते थे,पाते थे:वर्तमान पीढ़ी को जो स्क्रीन पर सब कुछ निभाते हैं और छू मंतर हो जाते हैं।

डा ओ पी चौधरी
सह आचार्य एवम् अध्यक्ष,मनोविज्ञान विभाग श्री अग्रसेन कन्या पी जी कॉलेज वाराणसी।
संरक्षक: अवधी खबर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *