व्यंग : पुलिसियाने में क्या हर्ज है

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व्यंग : पुलिसियाने में क्या हर्ज है

मेरे पिताजी का सपना था की मैं पढ़ लिखकर पुलिस की नौकरी करूंगा। यद्यपि पुलिस की नौकरी के लिए किसी विशेष अतिरिक्त योग्यता की जरूरत नहीं होती और जिस योग्यता की जरूरत होती है दौड़ – कूद सीना पुल – अप वह अपन में है नहीं इसलिए अपने बापू के अरमान आंसुओं में बह गए। हमारे पिताजी मुक्त की सब्जियां हफ्ते की कमाई जुगाड़ के पास से सर्कस देखने का लुफ्त नहीं उठा पाए। मेरा बेटा मोटरसाइकिल पर पुलिस लिखा कर नगर की कन्याओं के दिव्य दर्शन को निर्भय भाव से नहीं निकल पाया। मुझे बेहद अफसोस है की मैं एक मध्यम वर्गीय पिता के अत्यंत औसत स्वप्न की पूर्ति ना कर पाया। यद्यपि इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। ऐसे मलाईदार विभागों में नियुक्ति पूर्व जन्म के पुण्यों से ही प्राप्त होती है। लगता है उस जन्म में भी अपना ट्रैक रिकॉर्ड ऐसा ही खराब रहा होगा परंतु पुलिस के प्रति एक विशेष श्रद्धा मिश्रित कौतूहल भाव मेरे मन में सदा बना रहा। यह भाव उन भावों के अतिरिक्त था जो एक शब्द भारतीय नागरिक के मन में पुलिस की वर्दी देख उभरते हैं जैसे भय विस्मय शोक हास घृणा इत्यादि। पुलिस सदैव मेरे अनुसंधान का विषय रही मेरे मित्रों ने मेरी इस प्रवृत्ति को पहचान मुझे क्राइम रिपोर्टर बनने तक की सलाह दे डाली लेकिन मैं साहस न जुटा सका क्योंकि ना तो अपना रोबदार दाढ़ी वाला चेहरा था ना नाटकीय संवाद शैली और ना खतरे उठाने का दम मुझको यह भी पता था कि पुलिस और मीडिया का संबंध अत्यंत संवेदनशील है। आप इसे भूत पीपली का संबंध भी कह सकते हैं। यों भारतीय पुलिस के विषय में इतनी रोचक सूचनाएं आए दिन प्राप्त होती रहती है की किसी और मनोरंजन की आवश्यकता ही नहीं है। पुलिस को मानवीय और सभ्य बनाने की कोशिशें लगातार जारी है लेकिन अंग्रेजों के जमाने के जेलर वाला प्रभाव छुटे तब ना। पुलिस के विषय में जो तथ्य सबसे ज्यादा मुझे प्रभावित करता है वह है उसका अखिल भारतीय चरित्र। सर्वत्र एक सा आचरण। कर्म के प्रति एकतानता। एक सी निष्पक्षता। एक सी निस्संग दृष्टि। याचक और पातक के प्रति समभाव। गीता के सच्चे अनुशीलन यही है गांधी के दर्शन को हृदयंगम कर चलने वाली सर्वोदयी भी सब का उदय हो चौमुखी उदय घर परिवार काया अधिकारी अपराधी अपराध का सर्वतो मुखी उदय इसमें कल्याण का भाव निहित है। भोले नागरिक बंधुओं पुलिस के विषय में हमें अपनी मध्ययुगीन मानसिकता भी बदलनी होगी। हमारे पुलिस जन को भी अपनी थुल थुल काया रोबदार चेहरा घनी मूछों से छुटकारा पाना होगा। फिल्मों का इस क्षेत्र में योगदान सराहनीय है। उन्होंने पुलिस जन के कई संस्करण भारतीय जनता के सम्मुख रखे हैं। हास्यास्पद से लेकर चॉकलेटी तक और खलनायक से लेकर ठेठ लंपट प्रेमी तक चयन आपका अधिकार है। यो पुलिस और श्लोक वाचन परंपरा का संबंध वेद कालीन दिखता है यह श्रुति परंपरा के लोग ठहरे वाचिक परंपरा ही हमें एकवचन बहुवचन से लेकर दूर वचन और निरवचन तक ले जाती है। क्रोध की माया ही ऐसी मत मंद होती है वत्स ! एक दिवस हमने पार्क में एक पुलिस वाले को मंगेतर से नम्र निवेदन करते हुए सुना ए…. इधर आए ससुरी। वहन का कूं कूं कर रही है। श्रृंगार का ऐसा सघन रूप देख मन रोमांचित हो उठा लगता है। शिशुपाल इनके पूर्वज रहे होंगे उन्होंने सब गालियां तक का विश्व रिकॉर्ड बनाया था इनका पता नहीं क्योंकि इन्हें भला किसके चक्र से भय है। अब तो सुदर्शन से लेकर गदा तक इनके हाथ हैं। और दुर्योधन से लेकर दुशासन इनके साथ है भला हुआ कृष्ण का जो द्वापर में ही हो गए वरना कलयुग में तो ना जाने कितनी धाराओं में उलझते फिरते। भ्रष्टाचार को लेकर पुलिस पर बहुत आरोप लगते रहते हैं मैंने एक उच्च पुलिस अधिकारी से पूछा तो वह भोले कौन सा विभाग बचा है साहब ! इनकम टैक्स वाले के यहां करोड़ों रुपए पकड़े जाएं और कस्टम अधिकारी के यहां किलो में सोना मिले परंतु एक कांस्टेबल की जेब से 50 रुपल्ली मिलने पर हल्ला। मैंने कहा कानून और अधिकार की रक्षा फिर कौन करेगा ? वह बोले भ्रष्टाचार प्रत्येक सरकारी कर्मचारी का नैतिक अधिकार है। सर टॉमस रोहतक जहांगीर से तिजारत का पट्टा तब ही हासिल कर पाया था और फिर तुम तो प्रश्न पूछने के पैसे लो जनकल्याण की आड़ में आत्म कल्याण करो और हम समाज की कालिमां को मिटाने का मेहनताना भी ना ले। मैं भी एक कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी रहा हूं मैं जानता हूं कि हत्या का सबूत मिटाना गवाहों को तोड़ना पोस्टमार्टम रिपोर्ट बदलने जैसे काम शहज नहीं है इसके लिए विशेष किस्म के साहस की आवश्यकता होती है और वह साहब वर्दी धारण करने के उपरांत ही आता है। वस्तुतः वर्दी का नशा ही कुछ ऐसा होता है कि वर्दी वाला आदमी कब वर्दी वाला गुंडा बन जाता है पता ही नहीं चलता। मैं अधिकारी जी का महान प्रवचन सुन आवाक रह गया। मानवाधिकार का भरम राक्षस भी पुलिस विभाग का पीछा नहीं छोड़ता है। एक थानेदार मित्र ने मुझसे गंभीर होते हुए कहा यार कहीं इस विचार के जनक का पता मिले तो बताना। साले को ऐसा फिट करूंगा कि सब भूल जाएगा अधिकारी की देखरेख हमारी जिम्मेदारी है या जनता की तभी एक मंत्री महोदय की गाड़ी आकर रुकी थानेदार साहब ने सलाम ठोका और उनके चमचों से गल बहैया कर बतिआने लगे।मैंने फिर पूछा सर तो मानवाधिकार ? हां हां क्यों नहीं हमारे थाने में सुझाव पर सुझाव पेटिका लगी है। हम उस पर लिखवाने वाले हैं। निंदक नियरे राखिए, आप कभी पधारें हमारे स्वागत कक्ष सदैव ऐसे मौलिक सुझाव को की प्रतीक्षा में रिक्त पड़े रहते हैं। मैं घिघियाया वह कुटिल मुस्कान एक आगे निकल गए यूं बिहार उत्तर प्रदेश राजस्थान हरियाणा की पुलिस कि अंतरराष्ट्रीय ख्याति है इन राज्यों के पुलिस कर्मियों का मनोबल कुछ ज्यादा ऊंचा है बात करते-करते हाथ छोड़ देना और हाथ लगाते लगाते क्रिया कर्म कर डालो इनके बाएं हाथ का काम है। गुडगांव हो या मेरठ जयपुर हो या दिल्ली पुलिस का एक्शन एक थ्रिलर फिल्म सा आनंद देता है। स्त्रियों के विषय में सामंती संस्कार भला कहां छूट पाए हैं। जेही कि बिटिया सुंदर देखी तेही पर जाए धरे हथियार वाला अंदाज बरकरार है। इन सब खबरों को पढ़कर में पुलिस के प्रति अपार भक्ति और श्रद्धा भाव से भर जाता हूं। वर्दी देखकर मेरी घिग्घी बन जाती है और डंडा देख कांपने लगता हूं। क्या करूं पुलिस के प्रति व्यवहार का यही संस्कार मुझे विरासत में मिला है। सोचता हूं मां बाप भी अपने बच्चों को लेकर कितनी खुश फहमी के संसार में जीते हैं। मैं जो कभी अपने बच्चों को ढंग से गाली नहीं दे पाया व्यवस्था को गाली नहीं दे पाया वह भला पुलिस में क्या खाक भरती होता ? क्योंकि न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता के बिना कैसे काम चलता ? आप पुलिसियाने की सोच रहे हैं क्या? हां हां तो गरियाना चालू कर दें। ठीक बिल्कुल ठीक…. पहले घर से ही शुरू करें।

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