समाज व राष्ट्र के विकास में हमारा-आपका अवदान : डॉ ओ पी चौधरी

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समाज व राष्ट्र के विकास में हमारा-आपका अवदान : डॉ ओ पी चौधरी

संपादकीय। भारत वर्ष में प्राचीन काल में हमारी प्राकृतिक संपदाएं-जंगलों में फल- फूल से लदे वृक्ष,मनमोहिनी लताएं,जड़ी- बूटियां, तो नदियों में अमृत तुल्य स्वच्छ जल,जैव विविधता अन्य देशों की तुलना में अधिक रहीं हैं।शिक्षा में भी नालंदा,तक्षशिला जैसी संस्थाएं हिंदुस्तान को अग्रिम पंक्ति में खड़ा करते थे। सभ्यता और संस्कृति में हम सबसे आगे थे। आयुर्वेद, योग
का वर्चस्व था। अपनी ज्ञान-पिपासा की शांति के लिए अनेक लोग भारत की ओर अपना रुख करते थे। किन्तु वर्तमान समय में अधिकांश लोग और समाज अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। पूरे देश के किसान काफी लम्बे समय से आंदोलित हैं,जगह जगह कर्मचारी, शिक्षक सभी आंदोलित हैं। विभिन्न वर्गों में असंतोष व भय का वातावरण है। इसके कुछ कारण हमारी समझ में आते हैं। अत्यधिक धार्मिक उन्मुखता-आप सभी जानते हैं कि किसी भी धार्मिक ग्रंथ की रचना ईश्वर ने स्वयं नहीं की, यदि किसी के पास किसी भी धार्मिक ग्रंथ की रचना ईश्वर द्वारा रचित का प्रमाण है तो मेरा अनुरोध है कि वह हमारे भ्रम को दूर करे और यदि प्रमाण नहीं है तो हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि हम-आप एक सोची-समझी साजिश के तहत बेवकूफ बनाये जा रहे हैं। यदि आपको अब भी मेरी बात पर सन्देह है तो स्वयं आत्म निरीक्षण करके यह देखने का प्रयास करें कि धर्म के तथाकथित ठेकेदारों ने अपने और हमारे कितने हित सुनिश्चित किए हैं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि वह स्वयं को और एक समूह विशेष को लाभान्वित करने के लिए हमें ईश्वर के मूल रहस्य से अवगत न होने की साजिश रचे हुए हैं? हम इस रहस्य को जिस दिन समझ जाएंगे,उसी दिन से उनके अनेक हित जिसकी पूर्ति हम सभी से होती है,वह समाप्त हो जाएगा और हम निर्भीक और आत्मनिर्भर हो जाएंगे।
धर्मान्धता का ही परिणाम है कि आज केंद्र सरकार का जितना पूरा बजट है उतना एक ही मंदिर की सम्पत्ति है। यदि सभी मंदिरों/मस्जिदों/गुरूद्वारों/गिरजाघरों की पूरी सम्पत्ति,भारत सरकार अपने अधीन करके अपनी मुद्रा कोष का हिस्सा बना ले तो अमेरिका का डाॅलर रूपया से छोटा हो जायेगा और फिर यह भारत देश आर्थिक रूप से सशक्त हो जाएगा। फिर से देश सोने की चिड़िया हो जायेगा।
आप स्वयं विचार करें कि धर्म के ठेकेदारों ने भगवान के नाम पर चंदा एकत्र कर वहां भी घोटाला किया । यह धनराशि किसकी भलाई के लिए जुटाई गई है? क्या यह हमारे आपके उपयोग में कभी आ पायेगी? यह विचारणीय है कि इस धन उपयोग हम कैसे अपने लिए या लोकहित के लिए कर सकेंगे? यह लिखने में जरा भी संकोच नहीं है कि वास्तव में यही लोग देश के सर्वांगीण विकास के सच्चे दुश्मन हैं समाज के,देश के। कई अरबों की संपत्ति पड़ी हुई है,जिनका उपयोग ही नहीं हो पा रहा है और सरकारें कर्ज लेकर अपना काम चला रही हैं।
देश की शिक्षा पद्धति- हमारी शिक्षा पद्धति भी मानव संसाधन के सही प्रयोग की शिक्षा नहीं देती, यह युवाओं को रोजगार ढूंढने तथा करने को प्रोत्साहित करती है, यह स्वरोजगार की भावना को जन्म नहीं देती है, यह नवयुवाओं से लेकर प्रौढ़ शक्ति में भी आत्मविश्वास को बढ़ावा नहीं देती, जीवन लक्ष्य, कल्पनाशीलता, दूरदर्शिता,सृजनशीलता के गुणों को पैदा नहीं करती। इसी का परिणाम है कि मानव संसाधन का समुचित प्रयोग नहीं नहीं होता है और अधिकांश शक्ति व्यर्थ चली जाती है, जिससे देश के सर्वांगीण विकास में समुचित उपयोग नहीं है। युवा किसी भी समाज व राष्ट्र के थाती होते हैं,उनकी शक्तियों का राष्ट्र निर्माण में उपयोग कर हम और सशक्त हो सकते हैं।
ऐसी शिक्षा पद्धति को अपनाना होगा जो क्षमताओं और सीमाओं को वास्तविक रूप में अवगत करा सके, नवयुवाओं में उनके जीवन लक्ष्य, कल्पनाशीलता, दूरदर्शिता के गुणों को पैदा कर सके ,उनमें आत्मविश्वास की भावना जगे। आर्थिक योग्यता पैदा करने वाली शिक्षा पद्धति हो। स्वरोजगार को प्रोत्साहित करने वाली शिक्षा पद्धति हो। दुनिया के जिन देशों ने तकनीकी​ शिक्षा, स्वरोजगारी शिक्षा, आर्थिक योग्यता पैदा करने वाली शिक्षा पद्धति को अपनाया वह विकसित देश हैं। सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 बिना समुचित तैयारी के लागू कर दिया,जिसमें अभी अनेक खामियां हैं। इस पर और अधिक विचार-विमर्श होना चाहिए। व्यक्तित्व, दृष्टि,सृजनशीलता,आत्म प्रत्यय सभी के विकास पर जोर देना चाहिए।
जितनी जिसकी जनसंख्या उतनी उसकी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। देश में जनसंख्या के आधार पर नौकरियों में आरक्षण होना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि जातिगत जनगणना सरकार कराए, जिसकी पुरजोर मांग देश के कोने कोने से उठ रही है। बिहार के मुख्यमंत्री जी तो विपक्षी दलों को साथ लेकर प्रधानमंत्री जी से मिलकर जातिगत जानगणना के लिए ज्ञापन भी दिया। देश के कोने -कोने से ऐसी मांगें उठ रही हैं,लेकिन सरकार क्यों उदासीन है? यह समझ से परे है,जबकि अभी जब केंद्रीय मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ तो मीडिया यह बताते थक नहीं रही थी कि इतने मंत्री अमुक जाति/वर्ग से,इतने अमुक से, जैसे व्यक्ति नहीं, उसकी योग्यता,राजनैतिक परिपक्वता नहीं अपितु जाति के कारण मंत्रिपद मिला है। ऐसी स्थिति मे जातिगत जनगणना निहायत जरूरी है।
ऊंच-नीच की भावना से ऊपर आना होगा, क्योंकि ऐसा न करने से विद्वेष की भावना जागृत होती है जो एक दूसरे को नीचा दिखाने की तरफ मोड़ती है, जो शांति ,भाईचारे की भावना को जागृत नहीं होने देती है। किसी भी जाति के लोगों को ईश्वर/प्रकृति ने विशेष रूप से नहीं बनाया है, सभी के एक ही जैसे बाहरी एवं भीतरी अंग हैं,लहू का रंग व उसके गुण एक हैं। उनकी गुणवत्ता कार्यप्रणाली भी एक जैसी है। फिर ऐसा कौन सा कारण है जो बिशेष गुण को सिद्ध करता है। वैमनष्य की भावना से बचाने एवं देश को सर्वांगीण विकास की ओर ले जाने के लिए जनसंख्या के प्रतिशत के आधार पर ही सभी श्रेणी के पदों,प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक साथ ही प्राइवेट सेक्टर की सभी नौकरियों में भी आरक्षण को सुनिश्चित करना ही होगा, तभी सर्वांगीण विकास के साथ-साथ विकसित देश बनने की भावना को संजोया जा सकता है और एक सभ्य और समरस समाज की कल्पना की जा सकती है, इसके बिना सिर्फ झूठे सब्जवाग दिखाना तथा दूसरों को धोखा देना ही है।
हम जिस परिवेश में रहते हैं, उसे समाज और संसार कहते हैं,उसमें रहने के तौर तरीके,रीति-रिवाज,नियम-कानून बनाये गए हैं। हमें अनेक मतभेदों के बाद भी रहने की कला सीखनी पड़ती है। हमारे विचारों और व्यवहारों से ही आदतें निर्मित होती हैं, जो चरित्र का निर्माण करती हैं। हमें सामाजिक संबंधों का निर्वाह करना पड़ता है जो हमें शक्ति प्रदान करता है। अरस्तू ने ठीक ही कहा है कि हम एक सामाजिक प्राणी हैं,अकेले रह ही नहीं सकते हैं। यह भी सत्य है कि यह जरूरी नहीं कि जो पुराना हो,वह सभी ग्राह्य हो,कहा भी गया है-पुराणमित्येव न साधु सर्वम। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। बदलाव समय के साथ आते ही हैं। निश्चित रूप से हमारे कार्यों का समाज पर प्रभाव पड़ता है,जिससे हमारे आचरण,शिष्टाचार और संस्कार बनते हैं। अलग संस्कृति विकसित होती है। हमें समय की माँग के अनुरूप परिवर्तन करना ही होगा,तभी हम विकसित राष्ट्र की पंक्ति में खड़े हो सकेंगे।

डॉ ओ पी चौधरी
संरक्षक,अवधी खबर;
समन्वयक,अवध परिषद उत्तर प्रदेश।

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