अफ़गानिस्तान में गृहयुद्ध जैसे हालात

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अफ़गानिस्तान में गृहयुद्ध जैसे हालात

संपादक – आयुष सिंह

देश विदेश (अवधी खबर)। अफगानिस्तान के हालिया हालातों को देखते हुए ब्रिटेन बहुत चिंतित हैं ब्रिटेन नहीं चाहता कि अफगानिस्तान युद्ध के मार्ग पर पहुंच जाएं जिसके कारण ब्रिटेन के शीर्ष जनरल, सर निक कार्टर, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के नेताओं के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों का उपयोग पर्दे के पीछे से अफगानिस्तान को पूर्ण विकसित गृहयुद्ध में जाने से रोकने के लिए अपनी शक्तियों का प्रयोग कर रहे हैंl साथ ही साथ कतर को यूएस-ब्रोकर शांति वार्ता को रोकने में मदद करने के लिए कर रहे हैं। सप्ताहांत में एक वरिष्ठ अफगान प्रतिनिधिमंडल दोहा में वस्तुतः निष्क्रिय वार्ता को फिर से शुरू करने की कोशिश करने के लिए पहुंचा, महीनों के बाद, जिसने तालिबान को ग्रामीण अफगानिस्तान के अधिकांश हिस्सों में देखा है, हालांकि अभी भी उनके पास कोई शहर नहीं है। सूत्रों का कहना है कि कार्टर को पाकिस्तान के शीर्ष जनरलों में से एक के साथ एक निजी जेट में काबुल और इस्लामाबाद के बीच बंद करते हुए देखा गया है, और बहरीन में प्रमुख अफगान और पाकिस्तान के अधिकारियों के बीच एक बैठक का आयोजन किया गया है l इस प्रकार ब्रिटेन लगातार इस बात को लेकर क्रियाशील है कि अफगानिस्तान में गृह युद्ध जैसे हालात में उत्पन्न होने पाए | वहीं अमेरिका का कहना है कि अफगानिस्तान में गृह युद्ध जैसे हालात नहीं होंगे बावजूद इसके वहां एक अच्छी शासन व्यवस्था उत्पन्न होगी उनका मानना है कि तालिबान के रुख में बदलाव आया है अब तालिबान पहले जैसे रवैये को नहीं अपना रहा है
वही इस बीच रूस ने अमेरिका को इस बात को लेकर फटकार लगाई है कि अफगानिस्तान के मौजूदा हालात केलिए सिर्फ अमेरिका जिम्मेदार है।
रूस ने कहा कि अमेरिका अफगानिस्तान में अपने मिशन में विफल रहा है और युद्धग्रस्त देश की तेजी से बिगड़ती स्थिति के लिए विदेशी सैनिकों की वापसी को जिम्मेदार ठहराया अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद तालिबान तेजी से विशाल क्षेत्र में अपना पांव पसार रहा है पान की मंशा है वहां की सत्ता पर काबिज होना जिसके कारण अफगानिस्तान की सत्ता पर खतरा मंडरा रहा है । वहीं दूसरी ओर तालिबान का दावा है कि उसने देश के 85% हिस्से पर अपना कब्जा कर लिया है अगर इस बात पर सच्चाई हुई तो इसका जिम्मेदार सिर्फ अमेरिका होगा । बुद्धिजीवियों का मानना है कि अमेरिका ने अफगानिस्तान को उसके बुरे हालात में छोड़कर वहां से रफूचक्कर हो गया है , बस के बस की बात नहीं थी तो उसे रूस से मदद लेनी चाहिए थी मौजूदा स्थिति यह है कि अफगानिस्तान के हालत बद से बदतर होते जा रहे हैं।रुसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने शुक्रवार को अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी के साथ उज्बेकिस्तान में एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान अमेरिका पर निशाना साधा ।सर्गेई लावरोव पहले भी अमेरिका और नाटो सैनिकों की जल्दबाजी में वापसी को अफगानिस्तान की सुरक्षा के लिए घातक बता चुके हैं ।उन्होंने चेतावनी दी थी कि विदेशी सैनिकों की इस तत्परता से वापसी के चलते अफगानिस्तान में अराजकता की स्थिति पैदा होगी ।इससे आस-पड़ोस के देशों के लिए भी नया संकट खड़ा होगा।
पिछले हफ्ते अफगानिस्तान को लेकर तालिबान प्रतिनिधियों के साथ मॉस्को में वार्ता हुई थी । मीटिंग के दौरान तालिबान ने अफगानिस्तान के लगभग 85 प्रतिशत हिस्सों पर नियंत्रण का दावा किया था । मास्को तालिबान को लेकर स्थिति पर करीब से नजर बनाए हुए है ।रूस अपने पड़ोसी देशों में तालिबान के चलते संभावित संकट को लेकर चिंतित है । रूस को डर है कि अफगानिस्तान में हालात बिगड़ने से पड़ोसी देशों में शरणार्थियों की संख्या बढ़ेगी ,इससे आतंकी संकट भी खड़ा हो सकता है।
वहीं पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का कहना है कि अमेरिकी सैनिकों कि इस तरह की वापसी से मेरा दिल टूट गया है । वहीं चीन ने अफगानिस्तान से अमेरिकी और नाटो बलों की वापसी का स्वागत किया और कहा कि इससे देश को अपने लोगों की नियति अपने हाथों में लेने का एक नया मौका मिलेगा। चीन ने साथ ही विद्रोही तालिबान से आतंकवादी समूहों के साथ सभी तरह के संबंधों को खत्म करने का आह्वान किया ।विदेश मंत्री वांग यी ने तजाकिस्तान की राजधानी दुशांबे में मंगलवार को कहा कि 20 साल की सैन्य भागीदारी के शांति लाने में विफल रहने पर अमेरिका को अफगानिस्तान में अपनी भूमिका पर विचार करना चाहिए। अगर अफगानिस्तान में सत्ता का परिवर्तन होता है तो भारत के लिए चिंता का विषय होगा क्योंकि भारत ने अफगानिस्तान में अत्यधिक निवेश किया है और इसीलिए भारत हर संभव कोशिश करेगा कि अफगानिस्तान में गृह युद्ध के हालात ना उत्पन्न होने पाए , अन्यथा उसे अत्यधिक आर्थिक नुकसान होगा। उधर अमेरिका को भय सता रहा है कि तालिबान अफ़गानिस्तान से काबुल को अलग कर सकता है यह भी चिंता का विषय है। इसलिए सभी देशों को इस मुद्दे पर एक साथ आना चाहिए और अफगानिस्तान को बचाने के लिए समुचित प्रयास करना चाहिए।

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