कोविड-19 : बेपटरी अर्थव्यस्था को सुदृढ़ करने में ग्रामीण क्षेत्रों का योगदान

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कोविड-19 : बेपटरी अर्थव्यस्था को सुदृढ़ करने में ग्रामीण क्षेत्रों का योगदान

(उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के विशेष संदर्भ में)
कोविड-19 साल 2020 की एक अत्यंत भयंकर महामारी व त्रासदी है,जिसके कारण 24 मार्च, 2020 से लगातार 68 दिनों के लॉक डाउन,उसके बाद अनलॉक डाउन की लंबी श्रृंखलाओं ने हमारे जन- जीवन के साथ ही हमारी अर्थ व्यवस्था को बहुत बुरी तरह से प्रभावित किया है। हमारी पूरी अर्थ व्यवस्था बेपटरी हो गई है। बहुत बड़ी संख्या में कामगारों का पलायन शहरों से गांवो की ओर हुआ। उद्योग धंधे,कल – कारखाने,निर्माण कार्य सभी ठप हो गए।सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के अनुसार पिछले साल भर में 98 लाख लोगों की नौकरी गई है। कोरोना की दूसरी लहर ने दोबारा नया संकट पैदा कर दिया है। पहली लहर के बाद भारतीय अर्थ व्यवस्था तेजी से सामान्य होने की ओर बढ़ रही थी और इसमें ग्रामीण क्षेत्र बहुत बड़ी भूमिका निभा रहा है। सकल घरेलू उत्पाद (जी डी पी)में कृषि क्षेत्र की भागीदारी 13 फीसदी है,जो तीसरे नंबर पर आती है। कोरोना काल में भी रबी की फसल का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ था। कटाई व मड़ाई के समय थोड़ी राहत से निर्बाध रूप से यह कार्य संपन्न हुआ। लेकिन दूसरी वेब में फिर से बहुत बड़ी संख्या में दिल्ली,मुंबई,पंजाब, गुजरात से लोग उत्तर प्रदेश और बिहार आए। चूंकि उत्तर प्रदेश में पंचायतों के चुनाव चल रहे थे,इसलिए बाहर से आने वाले लोग बिना पृथकवास और संगरोध के सीधे अपने घरों को पहुंच गए। चुनाव के साथ ही सहालग और धार्मिक आयोजनों के फेर में गांवों तक कोरोना ने दस्तक दे दिया है,जहां जांच और इलाज दोनों के साधन कम हैं।
यह बात और गंभीर हो जाती है कि हमारी अर्थव्यवस्था पिछले वर्ष के लॉक डाउन के कारण पूरी तरह से पटरी पर नहीं आ सकी थी। अब पुनः उससे भी बुरी तरह से महामारी ने हमारे देश को प्रभावित किया है,और अबकी बार गांवों में भी संक्रमण बढ़ा हुआ है। प्रतिदिन पूरे देश में चार लाख से भी अधिक लोगों का संक्रमित होना बहुत बड़े खतरे की निशानी है। फिर भी सुखद संयोग है कि अब जब खरीफ की फसल बोई जा रही है, तैयारी चल रही है,तेजी से स्थिति सामान्य हो रही है। स्वास्थ्य सेवाओं में भी इजाफा हुआ है, सरकार भी चुनाव की व्यस्तता के बाद पूरी मुस्तैदी से महामारी के प्रकोप से बचाने के लिए अपनी सारी मशीनरी झोंक दी है। इस दौरान भी जब हर सेक्टर में नकारात्मक ग्रोथ थी,अकेले कृषि क्षेत्र ऐसा रहा,जिसमें सकारात्मक विकास दर रही है,अर्थात भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद कृषि सेक्टर पर ही आश्रित रही। एच डी एफ सी बैंक के प्रमुख अर्थशास्त्री अभीक बरुआ बताते हैं कि कोरोना महामारी के समय कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ताकत समझ में आई। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को और सुदृढ़ करने के लिए सरकार को कृषि क्षेत्र में व्यापक बदलाव व सुधार की जरूरत है:
1- मनरेगा के अन्तर्गत खेती के कार्यों को भी सम्मिलित किया जाए,जिसमें कार्य करने वाले को आधी मजदूरी संबंधित किसान ग्राम प्रधान के माध्यम से भुगतान करे और आधी सरकार वहन करे। राजकोष की बचत होगी साथ ही समय से खेती का कार्य भी सुगमता पूर्वक हो जायेगा, लागत भी कम आयेगी। सरकार की मंशा के अनुरूप किसानों की आय भी बढ़ेगी।
2- सभी फसलों के लिए न्यूनतम मूल्य निर्धारित किया जाय और किसानों से उसकी सीधे खरीद की जाय। बिचौलियों को सस्ते दामों पर अनाज के खरीद से रोका जाय। किसान सरकारी खरीद केंद्रों की मनमानी की वजह से सस्ते दामों पर इन बिचौलियों को आधार कार्ड, बैंक पासबुक व खतौनी की प्रति देकर बेचने को मजबूर है।
3- बुवाई से पूर्व ही किसानों को उत्तम बीज की व्यवस्था सहकारी समितियों/ग्राम पंचायतों के माध्यम से किया जाय।ब्लॉक स्तर से इसे ग्राम पंचायत स्तर पर लाया जाए।ताकि सभी को उनकी जरूरत के अनुसार मिल सके।
4- किसानों को प्रर्याप्त मात्रा में उर्वरक मुहैया कराया जाय,हरी खाद,कंपोस्ट खाद और जैविक खाद के प्रयोग हेतु विशेष योजना बनाकर उन्हें प्रेरित किया जाय और प्रशिक्षित किया जाय।
5- गन्ना, आलू,दलहन,तिलहन जैसी नगदी फसलों को बढ़ावा दिया जाय।इनके भी एम एस पी पर बिक्री का प्रबंध किया जाय।
6- घड़रोज और छुट्टा जानवर किसानों की फसल ही नहीं बरबाद कर रहे हैं, और उनको आर्थिक क्षति ही पहुंचा रहे हैं, बल्कि उन्हें शारीरिक व मानसिक रूप से कमजोर कर रहे हैं। जब दिन की कड़ी मेहनत के बाद रात को भी जागकर इन जानवरों से अपनी फसल की रक्षा करता है तो नींद न पूरी होने से अनेक बीमारियां उसे जकड़ लेती हैं। ऊपर से जो घर में जमा पूंजी थी उसे खेत में लगा दिया और छुट्टा जानवर उसे सफाचट कर गए तो “घर की मसुरी भी बयाना” वाली कहावत चरितार्थ हो गई। इसलिए सरकार के स्तर पर इन जानवरों का मुक्कमल प्रबंध किया जाय ताकि फसल बची रहे,किसान की आय बढ़े साथ ही देश की जी डी पी में भी वृद्धि हो सके। किसानों को प्रतिवर्ष मुफ्त (सम्मान निधि)में करोड़ों रुपए की इमदाद से भी राजकोष का बोझ कम हो जायेगा।मछली देने से अच्छा है उन्हें मछली पकड़ना सिखायें।
7- कृषि आधारित कुटीर उद्योग स्थापित किए जाने हेतु प्रोत्साहित किया जाय और उनके उत्पादित माल की बिक्री का पूरा प्रबंध किया जाय ताकि उन्हें वाजिब दाम मिल सके।
8- ग्रामीण क्षेत्र में बिजली,पानी,सड़क,स्वास्थ्य,
और शिक्षा का पूरा प्रबंध किया जाय,ताकि पलायन को रोका जा सके। लोग गांवों में रहकर कृषि कार्य व उससे आधारित कुटीर उद्योग को अपना सकें।
9- पधुधन और कृषि आधारित खाद्य प्रसंस्करण,उनके रख रखाव के पूरे प्रबंध किए जाय।यह कार्य सहकारी आंदोलन को बढ़ावा देकर किया जा सकता है।
10- किसानों को जो नगद धनराशि देकर सम्मान निधि बताया जा रहा है,उसके स्थान पर उन्हें सम्मान जनक और स्वाभिमानी जीवन जीने हेतु, श्रम करके अपना भोजन व अन्य जरूरी सामान जुटाने के लिए कृषि बीज, जुताई,उर्वरक,सिंचाई की सुविधा मुफ्त में उपलब्ध कराई जाए। ताकि वे श्रम करके अपनी रोजी और रोटी का प्रबंध करें। गांधीजी का भी मानना था कि । जो बिना श्रम किए रोटी खाता है,वह अपराधी से कम नहीं है।
निश्चित रूप से आत्मनिर्भर और विकसित भारत के निर्माण में ग्रामीण क्षेत्रों का बहुत महत्त्व है। अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने और जी डी पी को बढ़ाने में ग्रामीण इलाकों की भूमिका को और सार्थक बनाया जा सकता है। वरिष्ठ अर्थशास्त्री श्री अरुण कुमार जी का कहना है कि अबकी बार ग्रामीण इलाकों में भी वायरस का प्रसार हो गया है,इसलिए वहां भी उत्पादकता प्रभावित होगी।इसे ध्यान में रखकर हमें लघु एवम् कुटीर उद्योगों को प्रर्याप्त समर्थन देना होगा।,,,,नई लहर से निपटने के लिए भी हम तैयार रह सकेंगे। जान बचाने के साथ ही साथ भविष्य बचाने पर भी काम होना चाहिए।


……….डॉ ओ पी चौधरी
एसोसिएट प्रोफेसर मनोविज्ञान विभाग
श्री अग्रसेन कन्या पी जी कॉलेज, वाराणसी।

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