बाल जगत : चालाकी का फल

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बाल जगत : चालाकी का फल

लखनऊ। एक थी बुढ़िया, बेहद बूढ़ी पूरे 90 साल की। एक तो बेचारी को ठीक से दिखाई नहीं पड़ता था ऊपर से उसकी मुर्गियां चराने वाली लड़की नौकरी छोड़ कर भाग गई।
बेचारी बुढ़िया ! सुबह मुर्गियों को चलाने के लिए खोलती तो वे पंख फड़फड़ाती हुई सारी की सारी बुढ़िया के घर की चार दिवारी फादकर अड़ोस पड़ोस के घरों में भाग जाती और को को कुड़कुड़ करती हुई सारे मोहल्ले मैं हल्ला मचाती हुई घूमती। कभी वे पड़ोसियों की सब्जियां खा जाती तो कभी पड़ोसी काटकर उन्हीं की सब्जी बना डालते। दोनों ही हालातों में नुकसान बेचारी बुढ़िया का होता। जिसकी सब्जी बर्बाद होती वह बुढ़िया को भला बुरा कहता और जिसके घर में मुर्गी पकती उससे बुढ़िया की हमेशा की दुश्मनी हो जाती। हार कर बुढ़िया ने सोचा कि बिना नौकर के मुर्गियां पालना उसकी जैसी कमजोर बुढ़िया के बस की बात नहीं। भला वह कहां तक डंडा लेकर एक एक मुर्गी हाँकती फिरे जरा सा काम करने में ही तो उसका दम फूल जाता था और गुड़िया निकल पड़ी लाठी टेकती नौकर की तलाश में।


पहले तो उसने अपनी पुरानी मुर्गियां चलाने वाली लड़की को ढूंढा। लेकिन उसका कहीं पता नहीं लगा। यहां तक कि उसके मां-बाप को भी नहीं मालूम था कि लड़की आखिर गई तो गई कहां नालायक और दुष्ट लड़की! कहीं ऐसे भी भागा जाता है ? ना आता ना पता सब को परेशान करके रख दिया। गुड़िया बढ़ बढ़ाई और आगे बढ़ गई।
थोड़ी दूर पर एक भालू ने बुढ़िया को बढ़ बढ़ाते हुए सुना तो वह घूमकर सड़क पर आ गया और बुढ़िया को रोककर बोला गु र्र र बुड़िया नानी नमस्कार ! आज सुबह-सुबह कहां जा रही हो ? सुना है तुम्हारी मुर्गियां चलाने वाली लड़की नौकरी छोड़ कर भाग गई है। ना हो तो मुझे ही नौकर रख लो। खूब देखभाल करूंगा तुम्हारी मुर्गियों की।
अरे हटो तुम भी क्या बात करते हो ? बुढ़िया ने खिसिया कर उत्तर दिया एक तो निरे काले मोटे बदसूरत हो मुर्गियां तो तुम्हारी सूरत देखते ही भाग खड़ी होंगी। फिर तुम्हारी बेसुरी आवाज उनके कानों में पड़ी तो वे मुड़कर दरबे की ओर आएंगी भी नहीं। एक तो मुर्गियों के कारण मोहल्ले भर से मेरी दुश्मनी हो गई है दूसरा तुम्हारे जैसा जंगली जानवर और पाल लूं तो मेरा जीना भी मुश्किल हो जाए। छोड़ो मेरा रास्ता मैं खुद ही ढूंढ लूंगी अपने काम की नौकरानी।
बुढ़िया आगे बढ़ी और थोड़ी ही दूर पर एक सियार मिला और बोला हुआ- हुआँ राम-राम बुढ़िया नानी किसे खोज रही हो ? बुढ़िया खिसिया कर बोली, अरे खोज रही हूं एक भली सी नौकरानी जो मेरी मुर्गियों की देखभाल कर सके। देखो भला मेरी पुरानी नौकरानी इतनी दुष्ट छोरी निकली कि बिना बताए कहीं भाग गई अब मैं मुर्गियों की देखभाल कैसे करूं कोई कायदे की लड़की बताओ जो 100 तक गिनती गिन सके ताकि मेरी 100 मुर्गियों को गिन कर दरबे में बंद कर सकें। यह सुनकर सियार बोला, हुआ हुआ बुड़िया नानी यह कौन सी बड़ी बात है ? चलो अभी मैं तुम्हें एक लड़की से मिलवाता हूं। मेरे पड़ोस में ही रहती है रोज जंगल के स्कूल में पढ़ने जाती है इसलिए 100 तक गिनती उसे जरूर आती होगी। अक्ल भी उसकी खूब अच्छी है शेर की मौसी है वह आओ तुम्हें मिलवा ही दूं उससे।
बुढ़िया लड़की की तारीफ सुनकर बड़े खुश होकर बोली, जुग जुग जियो बेटा जल्दी बुलाओ उसे कामकाज समझा दूं। अब मेरा सारा झंझट दूर हो जाएगा। लड़की मुर्गियों की देखभाल करेगी और मैं आराम से बैठ कर मक्खन बिलोया करूंगी। सियार भाग कर गया और उसने अपने पड़ोस में रहने वाली चालाक पूसी बिल्ली को साथ लेकर लौटा। पूसी बिल्ली बुढ़िया को देखते ही बोली, म्याऊं बुढ़िया नानी नमस्ते। मैं कैसे रहूंगी तुम्हारी नौकरानी के काम के लिए ? नौकरानी के लिए लड़की जगह बिल्ली को देखकर बुढ़िया चौक गई। बिगड़ कर बोली हे भगवान कहीं जानवर भी घरों में नौकर हुआ करते हैं ? तुम्हें तो अपना काम भी सलीके से करना नहीं आता होगा। तुम मेरा काम क्या करोगी लेकिन पूसी बिल्ली बड़ी चालाक थी। आवाज को मीठी बना कर मुस्कुरा कर बोली बुड़िया नानी तुम तो बेकार ही परेशान होती हो। कोई खाना पकाने का काम तो है नहीं जो मैं ना कर सकूं। आखिर मुर्गियों की ही देखभाल करनी है ना ? वह तो मैं खूब अच्छी तरह कर लेती हूं। मेरी मां ने तो खुद ही मुर्गियां पाल रखी है। पूरी सो है। गिर कर मैं ही चराती हूं और मैं ही गिनकर बंद करती हूं। विश्वास ना हो तो मेरे घर चल कर देख लो। एक तो पूसी बिल्ली बड़ी अच्छी तरह बात कर रही थी और दूसरे बुढ़िया काफी थक भी गई थी इसलिए उसने ज्यादा बहस नहीं की और पूसी बिल्ली को नौकरी पर रख लिया। पूसी बिल्ली ने पहले दिन मुर्गियों को दरबे में से निकाला और खूब भागदौड़ कर पड़ोस में जाने से रोका।

बुढ़िया पुसी बिल्ली की इस भागदौड़ से संतुष्ट होकर घर के भीतर आराम करने चली गई। कई दिनों से दौड़ते भागते बेचारी काफी थक गई थी तो उसे नींद भी आ गई। इधर उसी बिल्ली ने मौका देखकर पहले ही दिन 6 मुर्गियों को मारा और चट कर गई। बुढ़िया जब शाम को जागी तो उसे पुसी की इस हरकत का कुछ भी पता ना लगा। एक तो उसे ठीक से दिखाई नहीं देता था और उसे 100 तक गिनती भी नहीं आती थी। फिर भला वह इतनी चालाक पुसी बिल्ली की शरारत कैसे जान पाती। अपनी मीठी मीठी बातों से बुढ़िया को खुश रखती और आराम से मुर्गिया चट करती जाती। पड़ोसियों से अब बुढ़िया की लड़ाई नहीं होती थी क्योंकि मुर्गियां अब उनके हाते में घुसकर शोरगुल नहीं करती थी। गुड़िया तो पूसी बिल्ली पर इतना विश्वास हो गया कि उसने मुर्गियों के दरबे की तरफ जाना छोड़ दिया। धीरे धीरे एक दिन ऐसा आया जब दरबे में बीस 25 मुर्गियां ही बची। उसी समय बुढ़िया भी चलती हुई उधर ही आ निकली। इतनी कम मुर्गियां देखकर उसने पूसी बिल्ली से पूछा, क्यों री पूसी, बाकी मुर्गियों को तूने चरने के लिए कहां भेज दिया ? पूसी बिल्ली ने झट से बात बनाई अरे और कहां भेजूंगी बुढ़िया नानी। सब पहाड़ के ऊपर चली गई है। मैंने बहुत बुलाया लेकिन वह इतनी शरारती है कि वापस आती ही नहीं। ओफ़ ओफ़ ! ये शरारती मुर्गियां। बुड़िया का बड़बड़ाना फिर शुरू हो गया। अभी जाकर देखती हूं कि यह इतनी ढीठ कैसे हो गई है? पहाड़ के ऊपर खुले में घूम रही हैं। कहीं कोई शेर या भेड़िया आ ले गया तो बस ! ऊपर पहुंचकर बुढ़िया को मुर्गियां तो नहीं मिली। मेरी सिर्फ उनकी हड्डियां और पंखों का ढेर ! गुड़िया को समझते देर न लगी कि यह सारी करतूत उसी बिल्ली की है। वह तेजी से घर की ओर नीचे लौटी। इधर पूसी बिल्ली ने सोचा की बुढ़िया तो पहाड़ पर गई अब वहां सिर पकड़ कर रोएगी जल्दी आएगी नहीं। तब तक क्यों ना मैं बची बचाई मुर्गिया भी चट कर लूं ? यह सोचकर उसने बाकी मुर्गियों को भी मार डाला। अभी वह बैठी उन्हें खा ही रही थी की बुढ़िया वापस लौट आई। पूसी बिल्ली को मुर्गियां खाते देख कर वह गुस्से से आगबबूला हो गई और उसने पास पड़ी कोयले की टोकरी उठाकर पूसी के सिर पर दे मारी। पूसी बिल्ली को चोट तो लगी ही उसका चमकीला सफेद रंग भी काला हो गया। अपनी बदसूरती को देखकर वह रोने लगी। आज भी लोग इस घटना को नहीं भूले हैं और रोती हुई काली बिल्ली को डंडा लेकर भगाते हैं। चालाकी का उपयोग बुरे कामों में करने वालों को उसी बिल्ली जैसा फल भोगना पड़ता है।

पूर्णिमा वर्मन………

 

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