दर्द दिखता क्यों नहीं ?

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व्यंग्य : दर्द दिखता क्यों नहीं


लखनऊ। आजकल मैं एक अजीब सी समस्या से जूझ रही हूं । सारे वक्त कहीं ना कहीं दर्द होता रहता है। दादी मां का नुस्खा आजमाया। गर्म पानी का बैग बनाया । और रख दिया दर्द वाली जगह पर । थोड़ी देर को दर्द गायब। फिर वही कहीं और प्रकट हुआ। अब सारे वक्त इस दर्द के पीछे कौन लगा रहे। शो टायलेनाल की गोलियां ले ली। लोग बाग कहने लगे हैं। आराम से सोते रहने के लिए अच्छा बहाना ढूंढा है । आजकल मेरे अंदर का लेखक भी सुस्त महसूस करता है । अरसे से कोई कविता कहानी लिखी नहीं गई । सो ऐसा कहना ना स्वाभाविक है। टायलेनाल खाने से नींद बहुत आती है। अब तो पतिदेव को भी उनकी बात में दम नजर आने लगा है । लेटा देखकर पूछते हैं फिर दर्द है? मैं परेशान हूं कि दर्द दिखता क्यों नहीं? बुखार होता है हाथ पैर गर्म हो जाते हैं थर्मामीटर लगाया, लो इतना बुखार है! जुकाम हुआ है आँ छी आं छी के मारे नाक में दम है। किसी को पूछने की जरूरत नहीं। लोग बचते फिर रहे हैं। छूत ना लगे उन्हें भी। तमाम किस्म के लोग हैं। दिखाई देते हैं। कैट स्कैन , एक्सरे,एमआरआई, किसी तरह तो दिख ही जाते हैं और यह मुंआ दर्द है कि दिखाई ही नहीं देता। अच्छे से अच्छा यहां मात खा जाता है। अरे क्या पार्टी में जाने का मन नहीं होगा। कह दिया दर्द है। अब थोड़ी सी एक्टिंग तो हम भी कर सकते हैं। लेकिन हम वैसे नहीं हैं। इतना भी नहीं सोचते पैसे बचाने की। एक गिफ्ट खरीद कर दे ही दी तो इतना भी किया गया! पीछे से सब सुन रही थी। सुनाने के लिए ही कहा गया होगा। सिर दर्द से फट रहा था लेकिन सुनने को मिला की अच्छी अभिनेत्री हूं।
अब ऐसा भी नहीं है कि लोग नाटक नहीं करते। हमने भी किए हैं। स्कूल जाने का मन ना हो तो पेट दर्द या सिर दर्द का बहाना सर्वश्रेष्ठ होता है। वैसे पकड़े जाने की संभावना भी रहती है। अच्छे भोजन से वंचित रह जाने की भी। झेला है वह भी। कॉलेज के दिनों में अपनी ही कक्षा की माधुरी अपने बॉयफ्रेंड के स्कूटर की आवाज सुनते ही सिर दर्द का बहाना बना लेक्चर के बीच में क्लास से फूट लेती थी। हम हैरान होते रहते कि इसे उसके स्कूटर की आवाज कैसे समझ में आती है। हमें तो सारे स्कूटर की आवाजें एक्सी लगती थी। लेकिन प्रेम में क्या नहीं होता! खैर……. अब कोई अनपेक्षित मेहमान आ गया चाय बनाने का मन नहीं तो थोड़ा मुंह बनाया, गिरी हुई आवाज में धीमे से बोल- क्या बताऊं इतना दर्द है पीठ में। ना उठा जाता है ना बैठा जाता है। उन्होंने शायद बधाया- नहीं नहीं। आप आराम कीजिए। मैं फिर आ जाऊंगा। बस हो गई मुक्ति।


अब हमें भी समझ में आता है। कहां हम अपेक्षित है ,कहां अनपेक्षित। कई बार यह भी हुआ कि किसी महफ़िल में किसी महिला मंडली में अनजाने ही शरीफ हो गए। नए नए लोगों से परिचाय करना चाहिए। लेखन का सामान और कहां से जुटाए हम ? वह भी जब अपने अंदर सूखा पड़ा हो। ऐसा ही एक वाकया है। उनकी गुप्त गु चल रही थी। उन्होंने हमें देखा। चेहरे पर मुस्कान बिखेरी। फिर उनमें से एक गोली आप तेलुगु हैं ? नहीं तो मैं चौकी। लेकिन हम हैं। वह प्यार से मुस्कुराई। मैंने सोचा अब तक तो हिंदी में बोल रही थी। फिर पूछा आप सब ? नहीं ,यह तमिल है। और यह राजस्थानी। वंदना पंजाबी है। हम सब अच्छी सहेलियां हैं। जवाब मिला। अच्छा मैं मुस्कुराई, मैं बिहार से हूं। मुझे तमिल या तेलुगु तो नहीं आती लेकिन पंजाबी समझ लेती हूं। वे आगे बढ़ी हम सब हाउसवाइफ हैं। आप ? मैं लिखती हूं। मैंने कहा। अरे वाह ! कुछ हमारे बारे में लिखिए। वैसे मेरे करीब सिमट आई। मैं खुश हुई। क्या भाव है हमारे। लेकिन जल्दी समझ में आ गया कि यह तो मुझे बाहर करने की कोशिश थी। उनका परनिंदा पुराण खुला हुआ था और ना वक्ता, ना पात्रों से परिचित थी मैं। वह इस मामले में मुझसे अच्छी कथाकार थी। मैं भाग निकली। खड़े-खड़े पैर में दर्द हो गया कह कर। जाते हुए उनकी खिलखिला हट पीछा करती रही। उस दिन बच गई थी। लेकिन विश्वास कीजिए अक्सर झूठ सुना है। दर्द की शिकार मैं ही रही। आपको नहीं लगताए दर्द मापने का कोई यंत्र होना चाहिए ? थर्मामीटर की तरह इतने डिग्री दर्द है। 15 डिग्री। 20 डिग्री। अरे नहीं झूठ बोलता है। कुछ दर्द वर्द नहीं है। ये देखो। दर्द मीटर देखो। कुछ नहीं है। और हो गई झूठ बोलने वाली की मिट्टी पलीद।


ऐसा हो सकता है न ? बन सकता है दर्द मीटर। इतने बड़े-बड़े आविष्कार हुए लेकिन किसी ने ऐसा मीटर नहीं बनाया अब तक क्यों ? मुझे लगता है वे वैज्ञानिक भी डरते हैं। आखिर कभी ना कभी तो दर्द का बहाना बनाकर छुट्टी की संभावना बनी रहनी चाहिए। दर्द की आड़ में आप कितना कुछ कर सकते हैं। है न ? लेकिन मीटर तो बनाया ही जा सकता है। उसकी कीमत इतनी ऊंची रखो कि आम आदमी की पहुंच से बाहर रहे। फिर क्या है ! चित भी आपकी पट भी आपकी। आपको दर्द है। आप भाग लीजिए। दूसरों के झूठ पकड़िए। उन्हें झूठा साबित कीजिए। आखिर मीटर तो आपके पास है। थोड़ी हेराफेरी भी की जा सकती है। अब दिल्ली मुंबई के ऑटो रिक्शा टैक्सी वाले ज्यादा भाड़ा वसूल नहीं करते क्या ? कैसे ? मीटर उनका है। गाड़ी उनकी है और रास्ते की जानकारी उन्हें हैं। यह तमाशा मैंने न्यूयॉर्क में भी देखा। कहां-कहां से घुमा ले गया टैक्सी वाला। पूरे 25 डॉलर का बिल बन गया। बाद में जानाए वहां से तक पैदल भी जा सकते थे। तो इसी तर्ज पर बन जाए दर्द मीटर। आप विश्वास करें ना करें मैं इस मसले पर गंभीरता से सोच रही हूँ। अपना आइडिया पेटेंट करवाने की अर्जी भी दे दी है। यहां सब लोग पहले पेटेंट लेते हैं फिर बात करते हैं उसके बारे में। मैं बेवकूफ थोड़े ही हूं। दे रखी है अर्जी तब बोल रही हूं। लेकिन इसके मूल में एक मुक्त भोगी की व्यथा है जो सचमुच दर्द से परेशान है। देश की तमाम समस्याओं को सोच सोच कर होने वाला दर्द, विदेश में रहने का दर्द, लेखक होने का दर्द, न लिख पाने का दर्द ,लिख पाने का दर्द, शरीर का दर्द, मन का दर्द इतने किस्म के दर्द हैं जो मुझे परेशान करते हैं। और किसी को देखता भी नहीं। झूठा समझते हैं मुझे। भारत देश की दुर्दशा का दर्द तो हमारे नेताओं की चीज है। दुख में मोटे हो रहे हैं। कृपया आप हंसे नहीं। दुख में कुछ लोग अधिक खाते हैं और खा- खाकर मोटे हो जाते हैं। यह वैज्ञानिक तथ्य है। अपने नेताओं को भी यह बीमारी हो सकती है। कुछ थोड़े से दर्द है जो आम आदमी के हैं। बड़े-बड़े दर्द बड़े लोगों की चीज है। मैं उनके बारे में नहीं सोचती। मैं आम आदमी के दर्द की सोचती हूं। और उसका मीटर बनाना चाहती हूं। सस्ता सुंदर और टिकाऊ। आप मेरे साथ है न ?

लेखक……इला प्रसाद

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