जानिये धान के खैरा रोग के लक्षण, कारण एवं उसका प्रबंधन : प्रो रवि प्रकाश

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जानिये धान के खैरा रोग के लक्षण, कारण एवं उसका प्रबंधन : प्रो रवि प्रकाश

लखनऊ। धान की फसल इस समय खेतो में लहलहा रही है। परन्तु जितना उत्पादन होना चाहिए उतना नही हो रहा है। इसका एक प्रमुख कारण मानसून की अनिश्चितता, किसानों को सही तकनीकी की जानकारी का अभाव के साथ ही साथ फसलों पर लगने वाले विभिन्न प्रकार के कीटों एवं रोगों का प्रकोप भी है,इन्हीं रोगों में से ही एक महत्वपूर्ण रोग है धान का खैरा रोग । आचार्य नरेंन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय कुमारगंज अयोध्या द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केन्द्र सोहाँव बलिया के अध्यक्ष प्रोफेसर रवि प्रकाश मौर्य ने धान की खेती करने वाले किसानों को खैरा रोग से बचाव हेतु सलाह दिया है।
रोग के कारण –
यह रोग जिंक नाम के पोषक तत्वों की कमी के कारण होता है। जिंक पौधों के लिए एक आवश्यक पोषक तत्व है तथा यह एन्जाइम का ही भाग होता है जो आक्सिन संश्लेषण एवम् शर्कराओं के आक्सीकरण से सम्बन्धित होता है। धान में खैरा रोग केवल उस भूमि में ही उत्पन्न होता है जिनमें इस पोषक तत्व का अभाव होता है तथा यह रोग उन मृदाओं में भी पाया जाता है जिन मृदाओं मे जिंक की उपस्थिति होने पर भी मृदा क्षारता या किसी अन्य कारणों से यह पोषण तत्व पौधों को उपलब्ध नहीं हो पाता हैं।
रोग के लक्षण –
इस रोग का सर्वप्रथम लक्षण पौधशाला में या धान की रोपाई के 10 से 15 दिन के बाद खेतों मे छोटे-छोटे टुकड़ों के रूप में दिखाई पड़ने लागता हैं। सर्वप्रथम रोग के लक्षण पौधों की पत्तियों के आधार पर हरिमाहीनता के रूप में प्रकट होता है और रोगी पौधों के पत्तियों पर सर्वप्रथम छोटे-छोटे भूरे रंग के धब्बों के रुप मे प्रकट होते है, जो समय के साथ बढ़ते हुए पत्तियों के सभी भागों में फैल कर कत्थई रंग में बदल जाते हैं जिससे की पूरी की पूरी पत्तियों सुखने लगती है।

यदि दूसरे लक्षण के रूप में देखा जाए तो रोग ग्रस्त पौधे छोटे रह जाते हैं तथा उनकी जड़ों का विकास भी रुक जाता है पौधों में या तो बालियां बन ही नहीं पाती या बनती भी है तो उन बालियों में दानों की संख्या कम हो जाती है। जिससे की फसल के उत्पादन में भारी गिरावट देखी जाती है यदि यह रोग उग्र रूप में उत्पन्न होता है तो पूरा का पूरा फसल ही नष्ट हो जाता है जिससे कि किसानों को काफी हानि कि सामना करना पड़ता है
प्रबंधन – 
धान की फसल पर 5 किग्रा जिंक सल्फेट , 20 किग्रा यूरिया को 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

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