खरीफ में मोटे अनाजों की खेती : प्रो. रवि प्रकाश

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लखनऊ। लघु या छोटे धान्य फसलों जैसे -मंडुआ, सावाँ, कोदों, चीना,काकुन आदि को मोटा अनाज कहा जाता है। इन सभी फसलों के दानों का आकार बहुत छोटा होता है। लघु अनाज पोषक तत्वों तथा रेशा से परिपूर्ण होने के कारण इसका औषधीय उपयोग भी है।
यह आयरन ,कैल्शियम, और प्रोटीन और फास्फोरस का अच्छा स्रोत है. मधुमेह रोगियों, ब्लड प्रेशर ,हड्डी के रोग और पाचन क्रिया संबन्धित रोगों में काफी लाभकारी होता, जिसके कारण मडुवाँ से रोटी,ब्रेड,सतू, लड्डू,, विस्कुट आदि एवं , साँवा ,कोदों, चीना, व काकुन को चावल ,खीर,दलिया, मर्रा के रूप में उपयोग करते है तथा पशुओं को चारा भी मिल जाता है। जहाँ पर मुख्य अन्य फसलें नही उगायी जा सकती वहाँ पर ये फसलें सुगमता पूर्वक उगा ली जाती है। प्रसार्ड ट्रस्ट मल्हनी भाटपार रानी देवरिया के निदेशक प्रो. रवि प्रकाश मौर्य (सेवानिवृत्त वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष) ने बताया कि ये फसलें सूखे ए्वं आकाल को आसानी से सहन कर लेती है। तथा 70-115 दिन मे पक कर तैयार हो जाती है तथा फसलों पर कीट एवं बीमारियों का प्रकोप कम होता है। ग्रामीण क्षेत्रों मे इन मोटे अनाजों के बारे अनेक कहावतें प्रचलित है जैसे –
मडुवाँ मीन ,चीन संग दही।
कोदों भात दुध संग लही।।
मार्रा, माठा,मीठा।
सब अनन्न मे मडुँवा राजा।
जब जब सेको, तब तब ताजा।।
सब अनन्न में सावाँ जेठ।
से बसे धाने के हेठ।।
खेत की तैयारी- मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुताई तथा 2-3 बार हैरो से जुताई करें । मंडुआ की उन्नति किस्में – शीध्र पकने वाली प्रजाति (90-95दिन) वी.आर.708, वी.एल.352, जी.पी.यू.45 है , जिसकी उपज क्षमता प्रति बीघा ( 2500वर्ग मीटर / 20 कट्ठा) 4-5 कुन्टल है। मध्यम व देर से पकने वाली प्रजाति (100-115 दिन) जी.पी.यू.28 ,67 ,85, आर. ए.यू.8 है। जिसकी उपज क्षमता 5-6 कुन्टल प्रति बीघा है। साँवा की प्रजाति – वी.एल. 172 (80-85 दिन) वी.एल. 207, आर.ए.यू.3 ,9(85 -90 दिन) कोदों प्रजाति -जे.के.65, 76, 13, 41, 155,439, (अवधि 85-90 दिन ) जी.पी.यू.के.पाली, डिडरी (अवधि100-115 दिन है चीना की प्रजाति कम अवधि (60-70दिन) एम.एस.4872 , 4884, तथा बी.आर.7, मध्यम व देर से पकने वाली प्रजाति (70-75दिन अवधि) जी.पी.यू.पी.21, टी.एन.ए.यू.151, 145 है। काकुन की उन्नत किस्मे- ,आर.ए.यू.-2, को.-4 ,अर्जुन (75-80.दिन अवधि) एवं एस.आइ.ए.-326 ,3085,बीजी.-1 मध्यम एवं देर से (80-85 दिन ) पकने वाली है। बीज दर-प्रति बीघा मडुँआ 2.5 -3.0 किग्रा. साँवा, कोदो.चीना, काकुन का 2.0 से 2.5 किग्रा. की आवश्यकता होती है। सभी फसलों की बुआई जून से जुलाई तक की जाती है। बुआई की दूरी- ,मडुँआ लाईन से लाईन 20-25 सेमी. पौध से पौध 10 सेमी. रखनी चाहिए। सावा ,कोदों. चीना एवं काकुन के लिये 25-30 सेमी. लाईन से लाईन तथा पौध से पौध की दूरी 10 से.मी. रखें। , सभी फसलों की बुआई की गहराई 2 सेमी से ज्यादा नही होनी चाहिए। खाद एवं उर्वरक- सभी फसलों में मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरक का प्रयोग करें। बुआई से पहले 17 किग्रा यूरिया, 62 किग्रा सिगल सुपर फास्फेट, ए्वं 10 किग्रा म्यूरेट आफ पोटाश का प्रयोग प्रति बीघा में करें। 25-30 दिन की पौध होने पर निराई के बाद 17 किग्रा यूरिया डालें। उपज क्षमता– साँवा, कोदों , चीना ए्वं काकुन की शीध्र पकने वाली प्रजातियों की 3-4 कुन्टल तथा मध्यम एवं देर से पकने वाली प्रजातियों की उपज 3.50 से 4.50 कुन्टल प्रति बीघा है।
अन्तवर्ती खेती- अरहर, ज्वार , मक्का के साथ आसानी से मोटे अनाजों की अंतः खेती किया जा सकता है।

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