छिटुआ तकनीक से धान उगाकर जगदीश प्रजापति ने दोहराया इतिहास

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छिटुआ तकनीक से धान उगाकर जगदीश प्रजापति ने दोहराया इतिहास

अंबेडकरनगर। प्रगतिशील कृषकों द्वारा छिटुआ धान तकनीक के माध्यम से धान की अप्रत्याशित पैदावार कर दूसरे किसानों के लिए उदाहरण बनते जा रहे हैं। छिटुआ तकनीक का फिर से चलन आरंभ होने से जहां एक ओर उत्पादन में वृद्धि हो रही है वहीं दूसरी तरफ परिश्रम और लागत में कमी के साथ ही समय की बचत भी हो रही है।
अकबरपुर विकास खण्ड के ऐसे ही एक प्रगतिशील किसान जगदीश प्रसाद प्रजापति ने उक्त तकनीक से धान की पैदावार कर मिसाल पेश किया है। जगदीश प्रजापति ने महज 10 बिस्वा भूमि पर छिटुआ धान बोया था। जिसमें आश्चर्यजनक रूप से सात क्विंटल से अधिक धान की पैदावार हुई। बकौल जगदीश प्रजापति उन्होंने धान बोने में पहली बार छिटुआ तकनीक अपनाने का निर्णय लिया। इसके लिए सरयू-52 बीच का चुनाव किया। वह बताते हैं धान की सरयू-52 प्रजाति ने ही अयोध्या स्थित नरेंदद्रेव कृषि विवि को पहली बार वैश्विक पहचान दी। उन्नतिशील प्रजाति की सरजू-52 130 से 135 दिनों में तैयार होती। जगदीश प्रजापति के मुताबिक दरअस्ल धान की खेती में रोपाई अब महंगी पड़ने लगी है। धान के एक-एक पौधे की रोपाई करनी पड़ती है और अब इसके लिए मजदूर मुश्किल से मिलते हैं।लागत भी अधिक आती जिससे लाभ का प्रतिशत नाममात्र का रह जाता है। ऐसे में धान की फसल हेतु छिटुआ पद्धति आने वाले समय में अन्नदाताओं के लिए वरदान साबित होगी। कृषि वैज्ञानिक डॉ. रामजीत ने भी रोपाई अथवा अन्य किसी तकनीक की अपेक्षा धान के लिए छिटुआ पद्धति को बेहतर बताया है।

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