गाँव-गिराँव: यादों के झरोखे से- खेत खलिहान

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अवधी खबर

अम्बेडकर नगर।खेत- खलिहान से तात्पर्य गांवों की आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था,सामाजिक ताना- बाना, आपसी तालमेल,मेल- मिलाप और साझी विरासत से है। चार-पांच दशक पूर्व के समय के गांव की तस्वीर सामने आते ही बैलों की जोड़ी,हल- जुआठ, पाटा, रहट,गन्ना पेरने का कोल्हू,लकड़ी के पहियों की बैलगाड़ी,खेत की जुताई के बाद बुवाई करते समय हल के पीछे कूड़ में बीज बोती कुसमी काकी, पियारी भौजी सहित अनगिनत नाम और चेहरे, सिर पर छोटी सी बांस की बनी मौनी में बीज रखे सधे कदम से हल के पीछे चलती महिलाएं जैसे कदमताल करते हुए सीमा पर जवान।कोल्हू हांकते हुए मन्नू बाबा,सुखई काका, निहोर काका, बिस्सू और किस्सू भाई, रहट हांकते रामदेव बाबा, कतारू काका,मटर के खेत में हाथा हथियाते बच्चू काका,खदेरू काका, बरहा की निगरानी में हम लोग भी बड़े शौक से लगे रहते थे, संते और मस्ते भी रहते थे।कहीं पानी कट जाय(नाली से पानी बाहर किसी अन्य के खेत में चला जाय)तो अच्छू बाबू (श्री अच्छे लाल राजभर)की डांट डपट, डर के बाद भी अपनत्व के नाते सभी कुछ कितना अच्छा लगता था पूरा समाजवाद,कोई भेद भाव नहीं,सभी का सम्मान,यथोचित आदर और स्नेह, साझी विरासत की संस्कृति लोगों को इस कदर पिरोए रहती थी कि क्या कहना। उस समय बेशक छुआछूत था,फर्क था लेकिन सम्मान सभी का था,लिहाज सभी का था।आज सभी भेदभाव समाप्त,खान- पान आपस में सभी में है,भौतिक समीपता है,लेकिन मन से,दिल से जो चाहत थी,जो मान सम्मान था,अपनत्व था,अब वह नहीं रहा।हम सभी में दिखावे की,प्रदर्शन की भावना बलवती हो गई।सभी के घर पक्के हो गए,लेकिन छप्पर और खपरेल की जो खुशबू थी,जो शांति थी,जो आनंद था सभी कुछ गायब।दीवालें बढ़ती गईं,मकान बड़े होते गए लेकिन दिल छोटे होते गए।प्रकृति के अनन्य उपासक पूज्य बापू राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी कहते थे कि जिस दिन हिन्दुस्तान के गाँव समाप्त हो जायेंगे उस दिन हिन्दुस्तान ही समाप्त हो जाएगा।इसके पीछे उनकी सोच थी कि असली हिन्दुस्तान गांवों में ही बसता है।
संस्कृति ,सभ्यता,रीति-रिवाज,परम्पराएं, प्रथायें,सामाजिक मूल्य और मानदंड गांवों में ही विद्यमान हैं।आज भी देखिये कि जितने भी धार्मिक अनुष्ठान हैं उनका गाँव का हर तपका बड़े ही जोरशोर से मनाता है।पंचक्रोशी परिक्रमा हो या फिर कांवड यात्रा!कौन कर रहा है? आज भी होली ,रामलीला,दुर्गापूजा,दीपावली,नागपंचमी जैसे त्योहार हमारे देश के ग्रामवासी बड़े ही धूमधाम से मनाते हैं। जनपद अंबेडकरनगर के जलालपुर तहसील का छोटा सा गांव मैनुद्दीनपुर, जहां की पावन माटी में पैदा हुआ,उसी में खेलकूदकर बड़ा हुआ,वहां और आसपास के गावों में अपने बचपन में मैं देखता था कि जब लड़के या लड़की का विवाह तय हो जाता था तो उसके बाद गाँव के पण्डित जी को बुलाकर विशेषरूप से घर की मालकिन (वैसे हमारे गांव में यह कार्य भगवान बाबा बड़े चाव से करते थे) उनसे उर्दी छूने,माँड़ो छाने और गाड़ने,हर्दी लगाने जैसे अनुष्ठानों की साइत पूछती थीं। उर्दी छूने के दिन से ही रात में खाने-पीने के बाद पूरे गाँव की महिलाएं और लड़कियां गीत गाना शुरु कर देती थीं। उसी में किसी न किसी दिन दारोगा-सिपाही बनकर सोये हुये पुरुषों को हड़काती भी थीं,ऐसा तब होता था जिस दिन गांव से बारात जाती थी, उस दिन की रात में।
जब बारिस समय से नहीं होती थी तब हर गाँव में छोटे छोटे लड़के दरवाजे-दरवाजे पानी गिराकर लोटते थे और चिल्ला-चिल्लाकर गाते थे कि-मेघा सारे पानी दे,नाहीं तो आपन नानी दे,जिसे हमारे यहां काल कलैया कहते थे। इसी तरह जब भोजन बनता था तब निश्चित रूप से दाल- चावल- आटा में से कुछ चुटकी निकालकर अलग-अलग बर्तन में रख दिया जाता था।जब कोई गरीब-दुखिया मांगने वाले या गोसाईं आते थे तब उन्हें दे दिया जाता था। जाड़े में जब भयंकर ठंढ पड़ती थी तब दरवाजे के सामने नीम/बरगद/इमली के पेड़ के नीचे अलाव(कौड़ा)जलाया जाता था।कौड़ा के किनारे पुआल बिछा दिया जाता था।उसी पर बैठकर सब लोग आग तापते थे।एक -दो जो गरीब-दुखिया रहते थे वे लोग अपना गमछा या चादर ओढ़कर वहीं सो जाते थे।विशेषकर जब कोल्हू चलता था,वहां बड़का कौड़ा जलाया जाता था उसी के सहारे सारी रात जागकर गन्ने की पेराई करते थे और गुड़ बनाते थे। शेष अगली कड़ी में,,,,,,,।
जोहार किसान! जोहार प्रकृति!

डॉ ओ पी चौधरी
प्रोफेसर एवम अध्यक्ष,मनोविज्ञान विभाग
श्री अग्रसेन कन्या पी जी कॉलेज वाराणसी।

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