जिसने दरें नबी पर सर को झुका लिया है…

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अंबेडकरनगर। इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद साहब के जन्मदिवस पर चार दिवसीय ईदमिलादुन्नबी कार्यक्रम के तहत शनिवार की रात में अंजुमन उस्मानिया मीरानपुर की ओर से नातिया मुशायरे का वार्षिक कार्यक्रम पुरानी तहसील तिराहा के समीप हाजी मुहम्मद नसीम खान की अध्यक्षता, फसीहुद्दीन कादरी के संचालन एवं अब्दुल रब, मुहम्मद सलमान, अनीस गुड्डू, शम्स तबरेज खान, अफरोज मनिहार, कमर खान आदि की देखरेख में संपन्न हुआ।


पड़ोसी जनपद संतकबीरनगर से आए मौलाना सैयद कमाल अशरफ अशरफी जीलानी ने बतौर वक्ता अपने ज्ञानवर्धक बयान में कहा इस्लाम धर्म के अंतिम पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब किसी एक के लिए नहीं बल्कि संपूर्ण सृष्टि के लिए रहमत यानी दयावान बन कर आए। यही कारण है कि वे रहमतुल्लिल मुस्लिमीन नहीं अपितु रहमतुल्लिल आलमीन कहे जाते हैं। मौलाना ने आगे कहा मनुष्यों के पास ईश्वर का संदेश लेकर आने वाले दूत, अवतार, प्रतिनिधि अथवा संदेश वाहक को अरबी भाषा में पैगंबर कहते हैं।

अंत में कहा ऐ आमिना मुबारक आंगन में अब तुम्हारे, बनके सरापा रहमत सरकार आ रहे हैं।
ख्यातिलब्ध शायरों ने नाते पाक का नजराना पेश किया तो अकीदतमंद झूम उठे। जिसमें गोपीगंज-भदोही के शाहिद रजा, नाथनगर के गौहर अशरफी, मोहम्मद गुलाम रब्बानी अकबरपुरी शामिल थे। शाहिद कमर व अकरम फरीदी जलालपुरी ने संयुक्त रूप से पढ़ा जिसने दरें नबी पर सर को झुका लिया है…। तथा मौलाना मोईनुद्दीन शेरी, मौलाना अबुल फायक मसऊद महबूबी, हाफिज नसीरुद्दीन शेरी, रसूल अहमद अंसारी आदि उपस्थित थे। गल्लामंडी शहजादपुर में मरकजी कमेटी की ओर से ईद मिलादुन्नबी का परंपरागत कार्यक्रम हुआ। जिसमें हाफिज शकील अख्तर, हाफिज निसार अहमद, हाफिज मुहम्मद जैश, हाफिज अब्दुर्रहमान, हाजी मुंतजिम अली, कफील अख्तर की उपस्थिति में मौलाना मुहम्मद अहमद बरकाती शहजाद्पुरी व मौलाना मुहम्मद इलियास सुल्तानपुरी ने बेहतरीन तकरीर किया और शायर सैफ शहजाद्पुरी सहित अन्य ने नाते पाक से समां बांधा। इसी कड़ी में रविवार को सुबह पांच बजे पेवाड़ा-मीरानपुर से जुलूस आमदे रसूल निकाला गया। जो मुहल्ले की गलियों से होता हुआ पुनः उसी स्थान पर पहुंचा। इस बीच नातखानी के साथ ही मक्की की आमद मरहबा, मदनी की आमद मरहबा के नारे लगते रहे। जिला मुख्यालय के विभिन्न इलाकों में दिन भर अंजुमनों की ओर से नातिया जल्सों की धूम रही जिसमें नाते पाक, मनकबत, कसीदाखानी और शेरों शायरी का दौर चला।

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