वृक्ष नहीं होंगे तो प्राणदायिनी ऑक्सीजन कहां से मिलेगी ?

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वृक्ष नहीं होंगे तो प्राणदायिनी ऑक्सीजन कहां से मिलेगी ?
आओ वृक्ष लगाएं हम,सांसें बचाएं हम

कहा जाता है कि वृक्ष हैं धरा के आभूषण,दूर करें प्रदूषण।वास्तव में इससे भी आगे अगर कहें कि वृक्ष हैं जीवन रेखा तो शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी। वृक्ष से ही सांसे हैं,जल है,जल है तो कल है,कल है तो जीवन है,सब कुछ है। शहर में गर्मी बहुत भीषण पड़ रही थी, चिपचिपी गर्मी तन-बदन को पसीने से तरबतर कर रही थी। पंखे की गर्म हवा अच्छी लगती नहीं तथा कूलर का प्रभाव तो कब का फेल हो चुका था,उनकी हवाओ में ठंढक का एहसास ही नहीं हो रहा था,चिपचिपी गर्मी और घुटन ही घुटन चारों तरफ व्याप्त थी। ए. सी. प्रत्येक जगह कहां संभव है, भीषण गर्मी ने दैनिक जीविकोपार्जन के कार्यो में दखल दे रखा था। शहर के लोग गर्मी से परेशान थे और वह बार-बार यही खबर जानना चाह रहे थे कि मानसून कब दस्तक देने वाला है..! भारत में छः प्रकार के ऋतुओं के होने का वर्णन है पर गर्मी की समय सीमा तो बढ़ती ही चली जा रही है अब तो यहाँ मार्च माह के मध्य से सितंबर माह के आखिर तक कमोवेश गर्मी रहती है एवं इस दौरान पंखे, कूलर और ए. सी. की आवश्यकता होती है।
मुझे महसूस हुआ कि इन शहरों में कंक्रीट के जंगल होने के कारण, दूसरे पक्की दीवालों में सूर्य की तपन होने के कारण गर्मी अत्यधिक हो सकती है। इधर कुछ दिनों से गांव की बहुत याद आ रही थी,विचार आया कि चलो चलें ग्राम दर्शन की ओर चलते हैं वहां धरती मां के आंचल के प्यार की ठंढक मिलेगी और खुले वातावरण होने के कारण गर्मी से निजात भी मिलेगी। मैने झट-पट दो जोड़ी कपड़ा लिया और निकल पड़ा अपने गाँव की ओर,सोंधी मिट्टी की खुशबू की ओर,बचपन की यादों में खोने की ओर, ताल तलैया बाग बगीचे की ओर,खेतों और मेड़ों की ओर,कामधेनु की ओर,,,,,आदि आदि की ओर।
पहुंच कर देखा तो ग्रामीण इलाके में भी गर्मी का वही मंजर था जैसे शहर में था। ग्रामीण समुदाय भी गर्मी से बड़ा परेशान थे और शहरवासियों की अपेक्षा ज्यादा शिद्दत से मानसून अगोर रहे थे,और यही जानना चाह रहे थे कि गर्मी से कब निजात मिलेगी..? कब मानसून आएगा..? कब से बरसात होने वाली है..? धरती जल रही है, जल के कोई उचित सार्वजनिक स्रोत न होने के कारण भारी संख्या में पक्षी एवं जीव-जंतु मर रहे हैं। धरती का भूगर्भ जलस्तर भी पहले की अपेक्षा ज्यादा नीचे चला गया है, ग्रमीण इलाके के अधिकांश हैंडपंप सूख चुके हैं जिनका समरसेबल का बोर है पानी की उपलब्धता फिलहाल उनके घर ही उपलब्ध है। गंगेश चाचा (श्री विपिन उपाध्याय) से बात करते करते सड़क पर आ गए। तभी हमने कुछ ट्रैक्टरो पर पीपल, बरगद, यू के लिपटस,आम के कटे पेड़ लदे जाते हुए देखा। हमने लोगो से पूछा कि इन पेड़ों को असमय में काट कर ही इसकी क्या उपयोगिता है..? रामलौटन काका,नरसिंह बाबू आदि ने बताया कि घर के ढलाई हेतु शटरिंग में इसका बड़े पैमाने में उपयोग किया जा रहा है तथा यह सस्ता भी पड़ता है और काट- छांट में सहूलियत होती है। पड़ताल करने के बाद हम यह निष्कर्ष पर पहुँचें की दादा परदादा के जमाने के लगाए हुए पीपल,बरगद,गूलर, पाकड़,इमली के पेड़ आज बड़े धड़ल्ले से ग्रामीण इलाकों में काटे जा रहे हैं। आज के तीस चालीस बरस पहले इन पेड़ों की कटाई नहीं होती थी,जबकि अभी भी ग्राम्य परिवेश में पीपल और बरगद दोनों का ही बहुत धार्मिक महत्व है,लेकिन अब व्यापारिक सोच के आगे यह भावना गौड़ हो गई। गांव के आस-पास खाली जमीन पर, पगडंडियों पर देखने को मिलता था और उस पेड़ के नीचे ग्रामीण समुदाय गर्मियों में बड़ी राहत और सकून के साथ श्वांस लेते थें तथा पक्षियों का भी आशियाना होता था,नीचे पशु भी बैठकर गर्मी की दोपहरी काटते थे। सब कुछ अच्छा चल रहा था पर जनसंख्या में अत्यधिक बढ़ोतरी एवं घटते स्थानीय जीविकोपार्जन के साधन, स्थानीय औद्योगिक क्रियाकलापो में नगण्यता, रोजगार के अभाव में लोग स्वरोजगार की चाहत में बिना सोंचे समझे प्राकृतिक संसाधनों का दोहन तेजी से करने लगे हैं और उनके लिए प्रकृति प्रदत्त वस्तुएं केवल व्यापार की उत्पाद वस्तु होकर रह गई है। यह विचार करना अति आवश्यक है कि प्राण वायु ऑक्सीजन प्रदान करने वाले इन पेड़ों का मानव सहित मानवेतर जीवन, पर्यावरण संतुलन, वर्तमान और भविष्य से क्या ताल्लुक है? इसका दूरगामी परिणाम कितना भयंकर हो सकता है? क्या इन पेड़ों के मौजूदगी के बेगैर धरती पर जीवन संभव है..? उत्तर एक ही आयेगा कदापि नहीं…!

प्रकृति की कितनी सुंदर व्यवस्था है। पीपल, बरगद, पाकड़ के पेड़ों पर निवास करने वाले पक्षी एवं आगंतुक पक्षी इनके फलों को खाते हैं और जहां-जहां उड़कर पुराने भवनों, दीवालो, कुएं, तालाब, किसी अन्य बृक्षों के कोटर आदि पर बैठकर जब बीट करते हैं तो वहां बरगद, पीपल, पाकड़ के पेड़ निकल जाते हैं, चूंकि भूमि पर सीधा प्राथमिक अवस्था में पीपल के पेड़ नहीं उगते बाद में जब वे थोड़ा बड़ा होते है तो दूसरी स्थान पर लगा देने से वे तेजी से विकास करने लगते हैं। प्रकृति ने तो इन पेड़ों को स्वतः पनपा दिया यदि मनुष्य उसे किसी स्थान पर ले जाकर लगा दे तो उसमें उसी का भला है कारण की इन पीपल,बरगद,पाकड़ के पेड़ों से भारी मात्रा में ऑक्सीजन का उत्सर्जन होता है तथा ग्राम्य परिवेश में इनकी प्रचुर मात्रा में उपलब्धता से वहां के वातावरण में ठंढक एवं शुद्ध प्राणवायु मिलती है। बरगद को राष्ट्रीय बृक्ष होने का गौरव प्राप्त है, वहीं पीपल को बिहार का राजकीय बृक्ष का सम्मान प्राप्त है। पीपल के पेड़ के नीचे ही गौतम बुद्ध को बुद्धत्व, ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। भारतीय सभ्यता संस्कृति एवं आध्यात्मिकता के दृष्टिकोण से पीपल बरगद के पेड़ो को अविभाज्य अंग माना जाता हैं एवं लोक साधना पूजा के एक महत्वपूर्ण केंद्र बिंदु भी। भगवान श्री कृष्ण ने गीता के 10 वें अध्याय में कहा है… “मैं वृक्षों में पीपल का वृक्ष हूँ। “महिलाएं बड़ी श्रद्धा भाव से इन पीपल, बरगद को देवता समझ पूजा-अर्चना कर मन्नत के धागे बांधती हैं। ये वृक्ष इस लिए पूजनीय है कि इनकी महिमा अपरम्पार है। पक्षियों का आश्रय, मनुष्यों के लिए तृप्तिदायक छाया, प्राण वायु ऑक्सीजन के साथ-साथ इनके जड़, फल,फूल तने पत्तियों कई असाध्य बीमारियों के इलाज में काम आते है। भारतीय सनातन सभ्यता संस्कृति तो प्रकृति के पूजक है इस लिए इन वृक्षो के देव तुल्य महिमा होने के कारण पूजे जाते हैं।
आधुनिक युग में देश की पौराणिक और मौलिक संस्कृति, रीति रिवाज,परंपरा से बेखबर पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव में बह कर बिना सोंचे समझे प्रकृत प्रदत्त अमूल्य धरोहर का दोहन कर रहे हैं। मैदानी भागों में जितने पेड़ की कटाई हो रही है उसके अनुपात में उतने पेड़ लगाये नहीं जा रहें…! और फिर लगाएं भी जायेंगे तो उतनी विशालता पाने में अनेक वर्ष लग जायेंगे। जंगलो में पाए जाने वाले वृक्ष भी महफूज नहीं हैं। दिन-प्रतिदिन उनकी अंधाधुंध कटाई हो रही है। आग लग जा रही है। पशु पक्षियों को भी धर पकड़ कर, खरीद-बिक्री कर धनार्जन में उपयोग हो रहा है,कुछ का शिकार मांसाहारी लोग कर रहे हैं, जिससे प्रकृति कुपित है,उसका संतुलन बिगड़ रहा है। जैव विविधता संरक्षण को झटका लग रहा है।
यह सभी के समवेत प्रयास से ही संभव होगा की सभी को शुद्ध प्राणवायु मिल सकेगी। प्रत्येक मानव यदि प्रति वर्ष मात्र दो-दो फलदार, इमारती लकड़ी या जनकल्याणकारी वृक्ष जैसे पीपल, बरगद, नीम, पाकड़,गूलर,इमली आदि को उचित दूरी पर लगाए और उसकी विधिवत देख-भाल कर के बड़ा करे,तो निःसंदेह प्राण वायु के संकट से हम बच सकते हैं, और इससे मनुष्य/प्राणी लंबे समय तक पृथ्वी पर स्वच्छ पर्यावरण में श्वास लेता रहेगा। वहीं दूसरी ओर फलदार वृक्षों से फल खाकर शरीर पोषण के दृष्टिकोण से तंदुरुस्त मजबूत होगा एवं इमारती लकड़ी के पेड़ जब अपनी पूरी वय प्राप्त करने के उपरांत स्वतः सूख जाएंगें तो उनकी लकड़ियों से धनार्जन किया जा सकता है तथा कई पेड़ पौधो में औषधीय गुण पाया जाता है इनके प्रयोग को बढ़ावा देकर एक नई रोजगारपरक जीविकोपार्जन उद्योग की स्थापना की जा सकती है।अर्जुन की छाल का मैं स्वयं ही सेवन करता हूं।
हमने, ग्रामीण इलाकों में भी शहर की तरह ही गर्मी व्याप्त देखा है,अब वहां भी कच्छी भीत के खपड़ैल घर बहुत खोजने पर मिलेंगे। पिछले 30 35 वर्ष के उम्र में मई-जून के माह में इस प्रकार के चिपचिपी तपन वाली गर्मी नहीं देखा था। इस प्रकार की गर्मी का एक मात्र कारण है इलाको में पेड़ो का अभाव, इक्का-दुक्का संख्या और उसमें पीपल, बरगद, नीम जैसे ठंढक, तृप्तिदायक एवं ऑक्सीजन का भारी मात्रा में उत्सर्जन करने वाले पेड़ो का काम तमाम कर खरीद बिक्री होने लगी है। पिछले कुछ सालों से जिसके कारण ही शरीर को तपन से,पसीना से तर-बदर कर देने वाली भीषण गर्मी का सामना करना पड़ रहा है। अभी भी वक़्त है समय रहते मानव सभ्यता को सचेत होने का नहीं तो अंजाम बड़ा ही भयानक होगा। प्रकृति अपनी नाराजगी पिछले कोरोना काल में ही व्यक्त कर चुकी है… कैसे लोग प्राण वायु ऑक्सीजन के सिलेंडरों के लिए तरस रहे थे और वे ऑक्सीजन के बिना तड़प-तड़प कर मर रहे थे। बाढ़ और सूखे की विभीषिका को झेल ही रहे हैं।लेकिन यदि प्रत्येक मनुष्य वृक्ष को लगाए और उसे प्रारंभिक अवस्था तक देख-रेख कर जिलाये तो यह नौबत नहीं आएगी। प्राण है तभी तो इस वसुंधरा का आनंद है तथा प्राण का रक्षण, प्राण वायु उत्सर्जक वृक्षो से होगा और उसी वृक्ष की बिना सोंचे समझे हम अंधाधुंध कटाई कर रहे हैं यह तो जिस डाली पर बैठें है वही डाली काटने वाली बात हुई न..? इसलिए हम सभी देश के जिम्मेदार नागरिकों को पेड़ लगाने हैं,पेड़ बचाने हैं यह प्रकृति की उच्चतम सेवा होगी,मानवता की सेवा होगी।
बिहार प्रदेश के निवासी और पीपल, नीम, तुलसी अभियान के संस्थापक सह अध्यक्ष डॉ. धर्मेंद्र कुमार जी प्राण वायु के संरक्षण हेतु जागरूकता के संदर्भ में देश में बड़ा ही अच्छा कार्य कर रहे हैं,अभी आपका वाराणसी प्रवास रहा है और हमारे महाविद्यालय के परमानंदपुर परिसर में आकर स्वयं नीम, अमरूद,आम,अशोक आदि के पेड़ लगाए और हम लोगों से भी लगवाए। आप निरंतर जनमानस की मानसिक मनोवृति में बदलाव लाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं,आजकल नीम कारीडोर विकसित करने में लगे हुए हैं,निःसंदेह वे प्रेरणा पुरुष हैं। इनसे जुड़ने एवं प्रकृति सेवा में योगदान देने की आवश्यकता है।
जय धरती मां! जय प्रकृति! जोहार किसान!
डा ओ पी चौधरी
अध्यक्ष,मनोविज्ञान विभाग
श्री अग्रसेन कन्या पी जी कॉलेज वाराणसी।
संरक्षक,अवधी खबर।

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